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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना: प्रभुवर से मित्रता

ओ३म् अश्वी रथी सुरूप इद्गोमान् यदिन्द्र ते सखा|
श्वात्रभाजा वयसा सचते सदा चन्द्रैर्याति सभामुप||साम २७७||

प्रभुवर से करे मित्रता जो, सुन्दर स्वरूप वह पाता है|
हर सखा सखा को अपनाकर, वैभव सम्पन्न बनाता है||

वह श्रेष्ठ देह का रथ देता,
वह बली अश्व सा कर देता,
कर्म ज्ञान की प्रखर इन्द्रियाँ
वह चन्द्र सरीखा मन देता|

उसका असीम सौन्दर्य कोष, कुछ‌ अंश सखा भी पाता है|
हर सखा सखा को अपनाकर, वैभव सम्पन्न बनाता है||

स्वाधीन आयु वह पाता है,
श्री रूपवान बन जाता है,
तन क्रियाशील गतिशील बने
अनुपम आनन्द बढ़ाता है|

जब सखा सखा के साथ रहे, तब गुण उसके पा जाता है|
हर सखा सखा को अपनाकर, वैभव सम्पन्न बनाता है||

प्रभु भक्त सभा में आता है,
सौन्दर्य प्रभा छा जाता है,
अधरों पर उपजी वाणी से
मधु रस सा झरता जाता है|

आह्लाद चन्द्र मुस्कान भद्र, दे प्रीति प्रतीति बढ़ाता है|
हर सखा सखा को अपनाकर, वैभव सम्पन्न बनाता है||

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द्दुलोक शत भूलोक शतं एकत्र हों सूर्य सहस्त्र विभो,
हे न्याय दण्ड से युक्त प्रभो, यह सब तुमसे है न्यून प्रभो|