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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Who is right

मेरे पास दो किताबें हैं।
उन दोनों में धारणा ध्यान समाधी करने की अलग अलग तरीके हैं।
पहली किताब: (१)धारणा:चित को शरीरस्थ या शरीर से बाह्य किसी स्थानविशेष पर रोक देन धारण है।
(२)ध्यान:जिस स्थान पर चित को रोका गया है,उस स्थान विशेष में बोध की सतता बनी रहना ध्यान कहलाती है।
(३)धारणा:वह ध्यान ही जब ध्येयवस्तुमात्रभासात्मक हो जाता है तथा स्वयं के होने की प्रतीति से रहित हो जाता है,समाधी कहलाता है।

दूसरी किताब: (१)धारणा:ईश्वर का ध्यान करने के लिये आँखें बंद करके मन को मस्तक,नासिका,कण्थ आदि एक स्थान पर रोक देने का नाम धारना है।
(२)ध्यान:एक स्थान पर रोक देने के बाद शब्दों के माध्यम से ईश्वर के बारे में चिंतन करना और उस समय अन्य बातों पर ध्यान न देना ध्यान है।
(३)समाधी:प्रमाणो के साथ ईश्वर का चिन्तन करने पर सजब ईश्वरब प्प्रत्यक्ष हो जाता है उस अवस्था का नाम समाधी है।

कृपया मुझे बतायें कि कौनसा तरीका ही सही है।या फिर दोनों तरीके एक हैं।

प्रिय जे

प्रिय जे वी बी जी
नमस्ते

यह विषय बहुत ही सूक्ष्म हैं , हर मनुष्य की वर्त्तमान स्थिति उसके लिए उपयुक्त कदम का निर्धारण करती है | उपरोक्त् दोनो विधियों में मुझे जो अन्तर प्रतीत होता है वह है, परमात्मा के मानने व न मानने का | यदि आप केवल एक बिन्दु मात्र पर ध्यान लगाते हैं तो यह एक भौतिक उपलब्धी मात्र ही तक सीमित रह जाएगा | यदि आप परमात्मा के गुणों का भी ध्यान करते हैं और अन्त में उसमें ही लीन हो जाते हैं तो यह वास्तविक समाधी की प्राप्ति होगी |

आनन्द‌

Always accept the truth and

Always accept the truth and decline the false
Thank you!

The first one is more

The first one is more correct The second one is coverd in that