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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Pakhand in YOg??????????

अब मुझे योग में भी पाखण्ड दिखायी पड रहा है।
शरीरस्थ सूर्य केन्द्र में धारण-ध्यान-समाधी करने पर लोक-लोकन्तरों का ज्ञान हो जाता है।(योगसूत्र:विभूतिपाद २६)
ऐसी बातें बालक करतें हैं।क्या आपको नहीं लगता कि यह सूत्र महर्षि पतंजलि ने नहीं बनाया था?और ये बाद में पाखंडियों द्वारा जोडा गया है?
इस सूत्र के बाद में अनेक गपोडे हैं कृपया देख लीजीये।

प्रिय जे

प्रिय जे वी बी जी
पाखण्ड योग में नहीं है | विशाल समय के अन्तराल में बहुत सारी बातें प्रक्षिप्त भी शास्त्रों मे आती रही हैं, उन पर मनन की आवश्यक्ता रहती है | परन्तु इनका समुचित समाधान का कार्य हर मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता | अब जो आपने उपरोक्त सूत्र में ही लिखा कि "धारण-ध्यान-समाधी करने पर लोक-लोकन्तरों का ज्ञान हो जाता है।" इसका पहले तो हमे विस्तार से अर्थ ही समझना होगा, उसके पश्‍चात ध्यान में जाकर उसके सही अथवा गलत होने का अनुभव करना होगा, उसके पश्‍चात ही हम यह कहने में सक्षम हो सकेंगे कि यह सही है अथवा गलत | अतः मैं नहीं समझता कि हमें इस प्रकार के जटिल विषयों में उत्तावली से काम लेना चाहिए |

आनन्द‌

Always accept the truth and

Always accept the truth and decline the false
आदरणीय आनंद जी
मैंने लोक - लोकान्तरों का अर्थ निम्न प्रकार से समझा:
लोक यानी एक गेलेक्षि।फिर लोकान्तर जोडने से सभी गेलेक्सियाँ।तो यानी पूरे ब्रह्मान्ड का ज्ञान हो जायेगा।किंतु क्या शरीर के किसी स्थान पर ध्यान देने से उन चीजों का ज्ञान हो जायेगा जिनके बारे में हमने सोचा नहीं है?कोई अनुमान न लगाया हो उन चीजों के बारे में।क्या इस शरीर में वो पूरा ब्रह्मान्ड समाया हुआ है?

विनय

प्रिय

प्रिय बन्धु
धन्यवाद
यह मानव शरीर लघु ब्रह्माण्ड है, ऐसा तो आपने भी कईं बार पढ़ा ही होगा | इसी को सत्य जानकर निरन्तर अभ्यास करने तथा स्वाध्याय आदि में रत रहने से ही हमें जिस जिस ज्ञान का हम साक्षात्कार करना चाहेंगे वैसा वैसा सत्य का अनुभव हो तो , इसमें मुझे तो को‍ई शँका नहीं लगती, चूँकि यह मानव शरीर एक अद्‍भुत यन्त्र है , अद्‍भुत प्रयोगशाला है, इसके द्वारा वेद ज्ञान का स्वाध्याय व मनन चिंतन करने पर हमें विश्व के बारे में बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है | परन्तु यह सब होने पर भी योगी का परम लक्ष्य ईश्‍वर की प्राप्ति ही है अतः वह इनकी सीमा मे‍ अपने को यदि नहीं बांधता , तो उसे ईश्वर का प्रत्यक्ष भी होता है, ऐसा मैं सोचता हूँ | परन्तु बिना ज्ञान के केवल ध्यान कैसे कोई लगा सकता है , इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए |

आनन्द‌