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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : दान प्रदाता

दान प्रदाता
ओ३म् सदा गाव: शुचयो विश्वधायस: सदा देवा अरेपस:||साम ४४२||

जो दान प्रदाता मानव है, वे अत्याचार नहीं करते|
देव हमारे सदा सुपावन, वे जगती का पालन करते||

गौएं कितनी कल्याणी हैं,
उन पर निर्भर सब प्राणी हैं,
वे हमको देती दुग्ध दान
शुचि सुन्दर हैं परित्राणी हैं|

गौओं के दुग्धदान से ही, हम आहुति यज्ञों में धरते|
देव हमारे सदा सुपावन, वे जगती का पालन करते||

दान

दान प्रदाता

जब उदीयमान होती ऊषा, गोशाला में पय को दौड़ें,
जब सूर्य उदित होता नभ पर, किरणें भी स्व मग में दौड़ें|

गौ चौपयी

गौ चौपयी घी दाता है,
गौ वसुन्धरा भी माता है,
सूर्य रश्मियाँ जीवन देती
प्रिय वेद गिरा धी दाता है|

गौ देह इन्द्रियाँ मानव की, सर्वत्र यज्ञ जिन से चलते|
देव हमारे सदा सुपावन, वे जगती का पालन करते||

नदियों का जल नहीं ठहरता,
वह सदा प्रवाहित ही रहता
आदान प्रदान जहाँ होता
भग्य वही है वही विमलता|

हम दान भाव का कर स्वभाव, श्री शुचिता अपनाये रहते|
देव हमारे सदा सुपावन, वे जगती का पालन करते||

राजेन्द्र आर्य‌