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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : सर्वत्र तुम्हारा गायन‌

ओ३म् गायन्ति त्वा गायत्रिणो5र्चन्त्यर्कमर्किण:|
ब्रम्हाणस्त्वा शतक्रत उदव्ंशमिव येमिरे ||साम ३४२ ||

वन पर्वत सरिता सागर तट, या नगर ग्राम वातायन है|
अनुराग रागिनी अनुगुञ्जित, सर्वत्र तुम्हारा गायन है ||

ऋग्वेद ज्ञान का गायक है,
कर्तव्य धनी यजु नायक है,
यह विनय्शील श्रुति सामगान
प्रभु भक्ति शक्ति उन्नायक है|

गुरु मन्त्र ग्रन्थ मन अभिव्यञ्जित, वसुधा में भरा विधायन है|
अनुराग रागिनी अनुगुञ्जित, सर्वत्र तुन्हारा गायन है ||

शतक्रतो तुम्हारी रचनायें,
कब किसकी गणना में आयें,
मानव के अनगिन कर्मों में
नभ तारक या वृक्ष लतायें|

शतशत कृतियों से अनुरञ्जित, निर्माण नियत सामायन है|
अनुराग रागिनी अनुगुञ्जित, सर्वत्र तुम्हारा गायन है||

भुजा उठा कर गायक गायें,
कहीं मौन दृग राग सुनायें,
कहाँ नहीं जय घोष तुम्हारा
ध्वज कहाँ नहीं तब लहरायें|

तब वंश विश्व में अनुपुञ्जित, खग मृग नर स्वर नारायन है|
अनुराग रागिनी अनुगुञ्जित, सर्वत्र तुम्हारा गायन है ||

नेताओं के

नेताओं के नेता स्तुतियाँ, सारी नभ के सम व्यापक हैं,
हे स्वामी बलों के पूज्य प्रभो, सज्जन रक्षक अधिनायक हैं |

राजेन्द्र आर्य
90413 42483