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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

संस्कृति को खतरा किससे है?

संस्कारसाक्षात्करणात पूर्वजातिज्ञानम्।।(योगसूत्र: विभूतिपाद १८)
कृपया इस सूत्र को ठीक से पढें।इसमें कठिन शब्द नहीं हैं।
संस्कारसाक्षात्करणात् = संस्कारों का साक्षात्कार कर लेने से
पूर्वजातिज्ञानम = पूर्व की जाती का पता चलता है।
संस्कारसाक्षात्करणात पूर्वजातिज्ञानम = संस्कारों का साक्षात्कार कर लेने से पूर्व की जाती का पता चलता है।
जाती=जैसे गाय,भैंस,बकरी ये जातीयाँ हैं।
तो यानी हम यह जान सकते हैं कि हम पूर्व जन्म में पशु थे वा मनुष्य।जैसे आपने एक पढे लिखे और बहुत धनाढ्य व्यक्ति के घर जन्म लिया है।यानी आपने पिछले जन्म में सुकर्म किये थे।क्या पशु इतने अधिक सुकर्म कर सकता है कि जिससे आप एक उतम घर में पैदा हों।नहीं।तो यानी आप पूर्व जन्म में मनुष्य ही थे।लेकिन इस सूत्र में ऐसा तो कहीं भी नहीं है कि आप जान सकते हैं कि आप पूर्व जम में किस देश,घर में थे।यह सूत्र तो केवल यही कहता है कि आप यह जान सकते हैं कि आप पूर्व जन्म में पशु थे वा मनुष्य।कुछ‌ लोग कहते हैं कि यह सूत्र कहता है कि आप यह जान सकते हैं कि पूर्व जन्म में किस देश,घर में थे।तो यानी वे लोग इस सूत्र का अर्थ करना नही जानते।क्या वे इस साधारण सूत्र का अर्थ नहीं कर सकते हैं?ऐसा तो मुझे नहीं लगता है।यदि ये लोग इस तरह से योगसूत्रों का अर्थ करेंगें तो फिर विज्ञान यह कहेगा कि भारतिय संस्कृति बेकार है।फिर हम हमारी ही संस्कृति को छोड‌ देंगें।हमारी संस्कृति को सबसे अधिक खतरा है तो वह है इन पाखन्डियों से जो कि वेदादि शास्त्रों का गलत अर्थ करके जनता को भ्रमित करते हैं।