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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : प्रभु गर्जन- भयवर्जन‌

ओ३म् तिस्त्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनव:|
हरि रेति कनिक्रदत‌

तेरा हल्का उचारण भी, प्रभुवर अवश्य सुन पायेंगे|
तेरी दु:ख पीड़ा हरने को, प्रभुवर हुंकार सुनायेंगे||

सुनकर वत्सों का परिरम्भन,
गौ माता का हो दोलित मन,
स्वयं रँभाकर दौड़ लगाकर
उन्हें पिलाये स्नेह दुग्ध पान|

तेरी पूकार की अकुलाहट, सब तेरे कर्म बतायेंगे|
तेरी दु:ख पीड़ा हरने को, प्रभुवर हुंकार सुनायेंगे||

अधिक नहीं बस तीन वचन हों,
गौ रूप इन्द्रियों के मन हों,
तन में घन मर्माहट के स्वर
स्वर में स‍चित कर्म सृजन हों|

मन वचन कर्म गर्माहट लख, प्रभु हृदय पिघल अपनायेंगे|
तेरी दु:ख पीड़ा हरने को, प्रभुवर हुंकार सुनायेंगे||

तेरी सत्ता तुझे चाहिये,
सत्ता में संगीत चाहिये,
संगीत साथ हो कर्म गीत
गीत प्रीति में मीत चाहिये|

तेरा तर्जन लख प्रभु गर्जन, भय वर्जन करते आयेंगे|
तेरी दु:ख पीड़ा हरने को, प्रभुवर हुंकार सुनायेंगे||

ओ३म्

ओ३म् तिस्त्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनव:|
हरि रेति कनिक्रदत|| साम ४७१ ||

अति मधुर सोम ऋत्विज के संग, यजमान हेतु ही टपका है,
मैं मन्त्र रचयिता ईश्वर को,पाऊँ ईश्वर तो सबका है |

क्या बात

क्या बात है वाह वाह ! आनन्द आ गया !

आचार्य जी बहुत 2 धन्यवाद

आनन्द‌