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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : हे सोम‌

ओ३म् सोम: पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्या:|
जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णो:|| साम ५२७ ||

हे सोम, सोम जग में तेरा, संवाहित होता रहता है |
यह सोम जगत का उत्पादक, इसमें पावनता भरता है||

धृति सम्मति गति का सोम सृजक,
शुभ्र दिव्यता का सोम जनक,
हम को विस्तार धरणि सा दे
यह बने हमारा संरक्षक |

यह तेज अग्नि सा कर प्रदान, उत्साह प्रवाहित करता है|
यह सोम जगत का उत्पादक, इससे पावनता भरता है ||

सम सूर्य सोम गतिशील करे,
हमको नियमित श्रमशील करे,
यह सोम बनाए इन्द्र हमें
बल देकर के सुखशील करे|

यही विष्णु बन विश्व राष्ट्र का, पालन सं‍चालन करता है|
यह सोम जगत का उत्पादक, इससे पावनता भरता है||

गति दिव्य धीरता अग्नि ओज,
दे सूर्य प्रभा ऐश्वर्य रोज,
विष्णु विश्व की करे पालना
यह सोम खिलाता शिव सरोज|

हे ओम सोम हे सोम ओम, भू व्योम होम से हँसता है|
यह सोम जगत का उत्पादक, इससे पावनता भरता है||