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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : पावन गुण गायन‌

ओ३म् सखाय आ नि षीदत पुनाय प्र गायत|
शिशुं न यज्ञै: परि भूषत श्रिये|| साम ५६८ ||

प्रभु के पावन गुण गायन से, मानस संसुचित होता है|
गुण पावन के अनुपालन से हर व्यक्ति विभूषित होता है||

एक नहीं सब सखा सहोदर,
बैठो मिलकर सभी यहाँ पर,
आओ प्रेम पूर्वक गाओ
प्रभु पुनीत के गीत मनोहर|

समवेत गान है महागान, अनुराग सुकूजित होता है|
गुण पावन के अनुपालन से हर व्यक्ति विभूषित होता है||

मुस्कान भरी शिशु की शुचिता,
निर्दोष सुशोभित निश्छलता,
अपनी जननी की गोदी में
शिशु का सुन्दर यज्ञ सिहरता|

शिशु पान मोदमय गोद वरे, सद्‍भाव सुपूरित होता है|
गुण पावन के अनुपालन से हर व्यक्ति विभूषित होता है||

प्रभु का गायन श्रेय प्रदायन,
दिव्य भव्यता दे नारायन
ऊँचा गिरि सा नम्र नदी सा
सतत सफलता देता गायन|

प्रभु के इस गायन- पूजन से, प्रिय भक्त सुपूजित होता है|
गुण पावन के अनुपालन से हर व्यक्ति विभूषित होता है||