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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : सच्ची बहिन उषा

ओ३म् उषा अप स्वसुष्टम: सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता||साम ४५१ ||

सम्ध्या की सच्ची बहिन उषा, अपनत्व अपरिमित वरती है|
बहिन बहिन को रहे सहायक, सब संकट मोचन करती है||

सौन्दर्य शान्त वैभवशाली,
अपनी अरुणोदय की लाली,
दी सन्ध्या को अस्ताचल में
बहिन उषा ने अपनी वाली|

दे प्रभा को जन्म उषा, संकुल कुल कुशल चमकाती है|
बहिन बहिन को रहे सहायक, सब स‍कट मोचन करती है||

सन्ध्या तम से घिर जाती है,
रजनी काली छा जाती है,
इस अन्ध तमस उद्धार हेतु
कर किरन उषा फैलाती है|

वह जनती प्रभा सहजता से, अभिमान न किंचित करती है|
बहिन बहिन को रहे सहायक, सब संकट मोचन करती है||

सूरज का उत्पादक प्रताप,
अति अहम लिये पर सूर्य ताप,
शीतल प्रकाश दे ललित उषा
सब हरण करे संताप श्राप|

गति मन्द मन्द पथ मोहक कर, यह देवी सहज विचरती है|
बहिन् बहिन को रहे सहायक, सब संकट मोचन करती है|

सामगान का

सामगान का प्रभाव :

साम वन्दना के इन मन्त्रों का गायन मैं प्रतिदिन दोनों काल सन्ध्या के पश्चात जब मस्ती से
करता हूँ तो मुझे ऐसा असीम आनन्द प्राप्त होता है, मानो परमपिता परमेश्वर के आनन्द
का भण्डार मेरे मानस मे स्थापित हो जाता है एक अजीब नशा सा हो जाता है|
इस नशे का मैं आदि (Addict) हो गया हूँ और इस नशे का प्रभाव दिन रात बना रहता है
नशा उतरता ही नहीं|

भंग भूसड़ी सुरापान उतर जाये प्रभात|
नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात ||

शराब पीकर उतरने वाली पिलायी तो क्या पिलायी साकी|
जो चढ़के इक बार फिर ना उतरे वो मय पिलाये तो हम भी जानें||

यदि आप परमात्मा के आनन्द को अपने अन्दर महसूस करना चाहते हैं
तो प्रतिदिन सन्ध्या करके साम वन्दना के इन मन्त्रों का गायन करके
नशे में दूब कर सदा आनन्दित हो जायें|

राजेन्द्र आर्य
संगरूर (पंजाब)
9041342483