Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : ज्ञानामृत‌

ओ३म् त्वमेतदधारय: कृष्णासु रोहिणीषु च |
परुष्णीषु रुशत्पय: ||साम ५९५ ||

जो तुमको ज्ञान- प्रकाश मिला, उसका आगे विस्तार करो|
इस ज्ञान- दुग्ध अमृत रस की, सर्वत्र प्रवाहित धार करो ||

मानव शरीर के काले हों,
अथवा काले मन वाले हों,
जो अन्धकार पर इतरायें
कुछ भाते नहीं उजाले हों|

अन्तरतम में हो तम जिनके, उनका अन्तर उजियार करो|
इस ज्ञान- दुग्ध अमृत रस की, सर्वत्र प्रवाहित धार करो||

उन्नति आरोहण वाले हों,
जो प्रीति हृदय में पाले हों,
इस ज्ञान- दुग्ध को पीकर के
पाते जो ओज निराले हों|

जो प्रभा पुञ्ज बनकर छायें, कुछ उनका तुम सतकार करो|
इस ज्ञान- दुग्ध अमृत रस की, सर्वत्र प्रवाहित धार करो||

जो कुटिल कुचाली अभिमानी,
हर कहीं करें जो मन मानी,
वे अस्त व्यस्त मदमस्त रहें
अत्यन्त विनाशी अपमानी|

मदपायी होवें पयपायी, इन अधर्मों का उद्धार करो|
इस ज्ञान- दुग्ध अमृत रस की, सर्वत्र प्रवाहित धार करो||

राजेन्द्र आर्य‌
9041342483