ऋषि दयानन्द
ऋषि ने बजाई भेरी, जाग उठा भारत
ऋषि ने बजाई बीन, नाच उठा भारत
ऋषि ने दिखाई राह, दौड़ रहा भारत
ऋषि ने हुकाँरा तो, हुकाँर उठा भारत
ऋषि ने जगाई ज्योती, जगमग जहान किया
वेदोँ की वाणी बोल,विस्मित जहान किया
प्रभु असली से सबको, मिला गया ऋषिवर
नकली प्रभु से छुट्टी, दिला गया ऋषिवर
सत्य का प्रकाश किया, दूर अन्धकार किया
अविद्या का नाश कर, वेद का प्रकाष किया
जात पात ढोँग और ढकोसले को दूर किया
अन्ध विश्वास के, गढ़ पर प्रहार किया
आत्मघात आत्महीनता को जड़ से दूर किया
आत्म विश्वास, प्रबल शक्ति मन्त्र फूँक दिया
निर्जीव पड़े भारत को, शक्ति से पूर्ण किया
सोते और लुटते भारतवासी को बेदार किया
बीज परिपक्व ऐसे बो गया ऋषिवर
बञ्जर और बेजान धरती सीँच गया ऋषिवर
आज जिसमेँ नए नए बाग और बगीचे हैँ
महकते हुए फूल फल,लहलहाते व्रिक्ष हैँ
लताएँ वनौषध, जलप्रपात भी भरपूर हैँ
लहलहाते बागो मेँ, फूलोँ की सुबास है
सत्य का उजाला प्रभु प्रेम की मिठास है
आओ इसे सीँचे सब खून पसीने से
सत्य से परमार्थ से, प्रभु प्रेम व पुरुषार्थ से
सारे ही विश्व मेँ जिसकी न मिसाल हो
अमरित हो, प्यार हो,ग्यान हो प्रकाश हो
प्राणी मात्र के परम सुख का आधार हो
आओ इसे सीँचें हम,आओ इसे सीँचें हम
