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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

यज्ञोपवीत और श्रावणी

यज्ञोपवीत और श्रावणी- गृह्यसूत्र के आधार पर परिपाटी रही है कि प्रत्येक प्रधान उत्तम यज्ञ-याग आदि कर्मों के समय नया यज्ञोपवीत धारण किया जाये। वर्तमान के इस मशीनी काल में समय के अभाव के कारण "वेद पारायण' का धीरे-धीरे अभाव होता जा रहा है तथा वेद पारायण की परिपाटी समाप्त सी हो गई है। "श्रावणीपर्व' का "उपाकर्म' तथा "उत्सर्जन' एक ही दिन मनाया जाता है। उसी दिन पुराने यज्ञोपवीत को उतारकर नए यज्ञोपवीत को धारण करने की प्रथा चल पड़ी है।

"यज्ञोपवीत' का महत्व हिन्दू समाज के प्रायः सभी वर्ग के महानुभाव जानते हैं और विशेषतः सब वैदिकधर्मी यज्ञोपवीत को धारण करते हैं और प्रसन्नता की बात है कि जो हिन्दू यज्ञोपवीत को धारण नहीं करते, वे भी इसका आदर करते हैं।

रक्षाबन्धन और श्रावणी- इतिहास गवाह है कि श्रावणी पर्व के दौरान चित्तौड़ की "महारानी कर्णावती' ने अपनी रक्षार्थ मुगल बादशाह हुमायूँ को भाई मानकर उससे सहायता मांगी थी और भाई-बहन के स्मृति चिन्ह के रूप में राखी भेजी थी। हुमायूँ ने राखी की लाज रखी और भाई के नाते अपना कर्त्तव्य निभाया तथा बहादुरशाह पर आक्रमण करके कर्णावती की सहायता की और चित्तौड़ को बचाया।

तब से यह प्रथा चल पड़ी और अब तो यह फैशन बन गया है कि बहनें भाइयों तथा पिता की कलाई पर राखी बांधती हैं और उपहार प्राप्त करती हैं। रक्षाबन्धन का चलन एक स्वस्थ परम्परा बन गई है, जिससे एक ओर भाई-बहन का विश्वास और प्रेम सुदृढ़ होता है तथा दूसरी ओर लड़कियॉं/महिलाएँ अन्य पुरुषों को अपना भाई बनाकर समाज में पनपती कुरीतियों को समाप्त करने में सहायता कर रही हैं। रक्षाबन्धन के त्यौहार के कारण विभिन्न सम्प्रदायों के बीच भाई-चारे का वातावरण भी बनता है और आपसी विश्वास का रिश्ता मजबूत होता है।

राजेन्द्र आर्य‌