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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

प्राणायाम से स्नायुमण्डल शुद्ध होता है

स्नायुमंडल को शुद्ध करता है प्राणायाम

वर्षा शर्मा
मानव जीवन में पहला सुख निरोगी काया का माना जाता है। यह "ाrक भी है अच्छे स्वास्थ्य के लिए हम क्या कुछ करने को तैयार नहीं हो जाते। योग भी शरीर को स्वस्थ रखने में हमारी सहायता करता है। चित्र वृत्तियों के शमन को योग कहा जाता है। योग के आ" अंग हैं, चौथा अंक पाणायाम है। पाणायाम के लिए आवश्यक है कि आप स्वयं पर मानसिक नियंत्रण रखें।
योग शास्त्र के रचयिता महर्षि पतंजली के अनुसार स्वाभाविक गति से चलने वाले श्वास, पश्वास को रोकना पाणायाम है। पाणायाम शरीर मन तथा पाण को शुद्ध कर देता है। इसके रोजाना अभ्यास से स्नायुमंडल शुद्ध होता है और आंतरिक चेतना जागृत होती है। कहा जाता है कि ऐसी कोई बीमारी नहीं जिसे पाणायाम के द्वारा "ाrक न किया जा सके।
मानव शरीर में अनेक नाड़ियां होती हैं जिनमें से तीन नाडियां इंड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाडियां खास हैं। इंडा जिसे चंद नाड़ी भी कहते हैं "ंडी होती है तथा विचारों को नियंत्रित करती है। शरीर का बायां भाग इसी नाड़ी के नियंत्रण में रहता है। पिंगला जिसे सूर्य नाड़ी भी कहते है "ंडी होती है। यह हमारी पाणशक्ति तथा शरीर के दाएं भाग का नियत्रंण करती है। मेरूदंड के मध्य से होकर मूलाधार तक सुषुम्ना नाड़ी होती है। यह न तो गर्म होती है और न ही "ंडी, यह इंड़ा और पिंगला के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायता करती है। पाणायाम के द्वारा सम्पूर्ण स्नायु मंडल पर नियंत्रण किया जा सकता है, विभिन्न अंगों की दुर्बलता को दूर कर यह शरीर को शक्तिशाली भी बनाता है।
सर्वविदित है कि हम सांस लेते हैं और जिस वायु में हम सांस लेते हैं उसमें मिली हुई आक्सीजन से हम जीवनी शक्ति पाप्त करते रहते हैं। यह ािढया निरन्तर चलती रहती है। इस पकार देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि हम सभी जाने अनजाने पाणायाम करते रहते हैं पाणायाम में मुख्य रूप से तीन ािढयाएं होती हैं सांस लेना, सांस छोड़ना और सांस लेने की इस ािढया को लगन व ध्यान से अलग-अलग पकारों से किया जाता है तो इसे पाणायाम कहते हैं।
मस्त्रिका पाणायाम- इसमें पूरी शक्ति से इंजन की तरह सांस लेना और छोड़ना चाहिए। यह ािढया पहले बाईं नासिका तथा फिर दायीं नासिका से करें। इससे श्वास नली और नाक पूर्णतया खुल जाते हैं और रक्त में गर्मी आ जाती है।
नाड़ी शोधन पाणायाम- इसके लिए कमर को सीधा रखकर आंखें बंद करके बै"sं फिर दाईं ओर के नासाद्वार अंगू"s से बंद करके पूरा सांस बाहर निकालें और बाएं नासाद्वार से सांस भरें, तीसरी अंगुली से बाईं नासिका को बंद कर सांस अंदर रोक लें (आंतरिक कुभंक) करें। आप स्वाभाविक तरीके से जितनी देर सांस रोक सकते हों केवल उतनी ही देर सांस रोकें। अब दांया अगूं"ा हटाकर गर्दन को थोड़ा आगे झुकाकर सांस बाहर निकाले, एक-दो क्षण सांस रोकें फिर गर्दन उ"ाकर दाएं नासाद्वार से सांस भरे (पूरक करें)। नासाद्वार बंद कर श्वास को रोकें फिर बाएं नासाद्वार से धीरे से सांस निकाल दें (रेचक करें)।
इस पूरी ािढया की पांच-सात बार दोहराएं। आरंभ में पूरक कुभंक व रेचक का अनुपात 1ः2ः2 रखें अर्थात् यदि 5 सेकेंड सांस भरने में लगते हों तो 10 सेकेंड सांस रोके और 10 सेकेंड में सांस निकालें। आंतरिक कुभंक से आक्सीजन फेफड़े के आंतरिक छिद तक पहुंचकर रक्त के विकार को शरीर से बाहर कर देती है इसलिए आंतरिक कुभंक के अभ्यास को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। इस ािढया से रक्त शुद्ध होता है तथा फेफड़े स्वस्थ व सािढय रहते हैं।
शीतली पाणायाम- इस ािढया में मुंह खोलकर जीभ को दोनों ओर में मोड़ कर (नलीनुमा बनाकर) सांस अन्दर खींचे (पूरक) फिर मुंह बंदकर कुछ क्षण रूककर नाक से बाहर निकाल दें। इस ािढया को पांच दस बार दोहराएं इससे शरीर में "ंडक आती है।
सूर्यभेदी पाणायाम- दाएं हाथ की सबसे बड़ी उगुंली से बाएं नासाद्वार को बंद कर दाएं नासाद्वार से लंबी सांस भरें फिर कुंभक करके दाईं नासिका से ही धीरे-धीरे श्वास निकाल दें। इसे कई बार दोहराएं।
भ्रामरी पाणायाम- दोनों हाथों के अंगू"ाsं से दोनों कान बंद कर लें तथा दोनों हाथों को ऊपर रखें। कुहनी ऊपर उ"ाए रखें। अब पूरा सांस भरकर कुछ क्षण कुंभक करें और भौरे की तरह गुंजन करते हुए धीरे-धीरे लंबा करते हुए रेचक करें। इस ािढया को चार-पांच बार दोहराएं। इस ािढया में गुंजन से जो कंपन पैदा होता है वह मस्तिष्क तथा स्नायु मंडल को शांत करता है।
अग्निसार ािढया- यह ािढया पाचन को "ाrक रखती है। इसमें श्वास को पूरी तरह बाहर निकालकर पेट को कई बार अंदर-बाहर करें। इस ािढया को दो-तीन बात करें।
उज्जाई पाणायाम- यह ािढया गल ग्रंथि तथा स्नायुमंडल को पभावित करती है। जिस पकार सोया हुया व्यक्ति खर्राटे लेता है उसी पकार गले को दबाकर खर्राटे से सांस लें और सांस छोडें। इसे पांच सात बार दोहराएं। इससे उत्पन्न कंपन लाभदायक होते हैं।
समग्र रूप में देखें तो पाणायाम फेफड़ों को मजबूत करता है, उनका लचीलापन बढ़ाता है जिससे शरीर को अधिक से अधिक आक्सीजन मिले जिसका उपयोग शरीर के विकारें को बाहर निकालने में होता है। इससे मस्तिष्क के स्नायुमंडलों पर भी पभाव पड़ता है जिससे मस्तिष्क संबंधी सभी विकार दूर हो जाते हैं।

प्रेषक :

राजेन्द्र आर्य‌