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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आचार्य डा. संजयदेव के प्रेरणाप्रद लेख एवं परिचय‌

जब स्वतन्त्रता देवी भारत भूमि पर उतरी-1

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतन्त्र होगा, यह लार्ड़ माउंटबेटन ने तय किया था (कुछ सोच-विचार कर नहीं, योंही क्षणिक आवेश में)। परन्तु सत्ता हस्तान्तरण का सही मुहूर्त कौन सा हो, यह फलित ज्योतिष धुरन्धरों ने तय किया था । ठीक आधी रात का समय, जब घंटा और मिनट बताने वाली दो सुइयां बारह बजे एक-दूसरी के ऊ पर होंगी । इस समय यदि स्वतंत्र भारत का जन्म हो तो वह शान्ति, सुख और समृद्धि में रह सकेगा । इसलिए प्रभात की प्रकाशभरी वेला के बजाय आधी रात का अंधेरा समय चुना गया । बृहस्पतिवार समाप्त होकर शुक्रवार शुरु होगा । असुर गुरु शुक्राचार्य का दिन। वेद मंत्रों से हवन- भारत की सविधान सभा के अध्यक्ष डा. राजेन्द्रप्रसाद ने अपनी कोठी में वेद मंत्रों से हवन करवाया । इसमें कुछ ही देर बाद मंत्री बनने वाले महानुभाव सम्मिलित हुए । संविधान सभा ठसाठस भरी थी । सदस्य अपनी कुर्सियों पर बैठे घड़ी की सुइयों को देख रहे थे, जो मन्थर गति से 12 के अंक की ओर बढ रही थी । नेहरु जी का कवित्वमय भाषण- अस्थायी सरकार के प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु खड़े हुए । उन्होंने इस अवसर के लिए कोई लिखित भाषण तैयार नहीं किया था । शब्द स्वत: उनके मुख से निकलने लगे- ""बहुत वर्ष पहले हमने नियति से एक वायदा किया था और अब समय आया है, जब हम पूरा न सही, उस वायदे को काफी कुछ निभा सकेंगे । बारह बजते ही, जबकि दुनिया सो रही है, भारत जीवन और स्वाधीनता में जाग उठेगा ।'' और भी बहुत से प्यारे-प्यारे शब्द धाराप्रवाह उनके मुख से निकलते गये - ""इतिहास में एक क्षण आता है, कभी-कभी ही आता है, जब हम प्राचीन से निकलकर नवीन में प्रवेश करते हैं, जब एक युग समाप्त होता है और बहुत समय से दबाकर रखे गये राष्ट्र की आत्मा मुखर हो उठती है । इतिहास के उषा काल में भारत ने अपनी अन्तहीन खोज यात्रा शुरु की थी और अनगिनत शताब्दियॉं उसके प्रयासों तथा सफलताओं और विफलताओं की गरिमा से भरी हैं । सौभाग्य और दुर्भाग्य, दोनों में ही उसने उस लक्ष्य को आखों से ओझल नहीं होने दिया और न उस आदर्श को ही भुलाया है, जिससे उसे शक्ति प्राप्त होती रही है । आज हमारे दुर्भाग्य का एक युग समाप्त हुआ और भारत ने अपने स्वरूप को फिर खोज निकाला है ।'' स्वाधीनता का शंख बजा- ज्योंही घड़ी ने 12 बजाये, त्योंही संविधान सभा का हाल शंख की तीखी आवाज से गूंज उठा । यह माना गया कि इस क्षण एक युग समाप्त हुआ और एक नये युग का आरम्भ हुआ । उसके बाद नेहरु जी ने प्रस्ताव किया कि अब हम सब सदस्य खड़े होकर भारत और उसके निवासियों की सेवा करने की शपथ लें । शपथ ली ही जा रही थी कि आकाश में घोर घनगर्जना हुई, जिससे संसद भवन कांप सा उठा । साथ ही मुसलाधार वर्षा शुरु हो गई । स्वाधीनता समारोह मनाने के लिए खड़ी विशाल भीड़ बुरी तरह पानी में भीग गई । परन्तु हर्ष के आवेश में किसी ने भीगने की परवाह नहीं की । नई दिल्ली में स्वाधीनता प्राप्ति का उत्सव बड़े जोश से मनाया गया । किसी भी होटल में, रेस्तरां में एक भी कुर्सी खाली नहीं थी । लोगों ने खाया-पिया-गाया और नाचे, खूब नाचे । संसद से बाहर कुछ और रूप- संसद भवन के बाहर भी आनन्द काफी फीका हो गया था । वर्षा ने सारा मजा किरकिरा कर दिया था । रही-सही कसर उन टेलीफोनों ने पूरी कर दी थी, जो पंजाब, सिन्ध और उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त से आ रहे थे । उनमें भयावनी खबरें थीं कि कैसे शहर लुट रहे हैं, गांव जल रहे हैं और लाखों आदमी, मर्द-औरतें और बच्चे-बूढे तथा बीमार जान बचाने के लिए घायल जानवर की तरह भाग रहे हैं । सिलसिला कई दिन से, बल्कि सप्ताहों से चल रहा था । यह तय हो गया था कि सिन्ध-बलोचिस्तान- उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त तो निश्चित रूप से पाकिस्तान में जायेंगे, पंजाब का पश्चिमी भाग पाकिस्तान में जायेगा और पूर्वी भाग भारत में रहेगा । परन्तु पश्चिमी और पूर्वी पंजाब की सीमा रेखा कहॉं बनेगी, यह तय नहीं था । श्री मुहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे । वह समझते थे कि पाकिस्तान उनकी इच्छा से बन रहा हे । पाकिस्तान बनाने के लिए और उसके प्रथम राष्ट्रपति बनने के लिए उन्होंने बहुत प्रयत्न किया था और सफल भी हुए थे । परन्तु पाकिस्तान बनाने वाले दिमाग कोई और थे । श्री जिन्ना ने अपने भाषण में कहा था कि पाकिस्तान हिन्दुओं का भी उतना ही होगा, जितना मुसलमानों का । यदि यह उनके मन की बात थी, तो यह मानी नहीं गई । जब से पाकिस्तान बनने की बात तय हुई, तभी से उसे इस्लामी देश बनाने का प्रयत्न शुरु हो गया । गैर मुस्लिमों को मारपीट कर, लूटकर भगा देना उनकी योजना का अंग था । वह योजना क्रियान्वित की जा रही थी । गुंडों के गिरोह दूसरे शहरों से आते । परिचित को चाकू मारते थोड़ी हिचक होती है, अपरिचित को मारते कोई हिचक नहीं होती । धार्मिक उन्माद और लूट का लोभ जगाया गया । मुस्लिम पुलिस और सेना तटस्थ दर्शक बनकर हिन्दुओं को लुटते-मरते देखती रही । हिन्दुओं के सामने बाप-दादों के घर छोड़कर भागने के सिवाय कोई विकल्प न रहा । जिन्होंने अड़ियलपन दिखाया, उन्हें कत्ल कर दिया गया । पंजाब का रक्तस्नान- गांव देहातों में हिन्दू आबादी कम थी, इसलिए उन्हें डराना-भगाना आसान था । देहातों के हिन्दू इस आशा में शहरों की ओर भागे कि वहॉं कुछ सुरक्षा होगी । परन्तु अगस्त के पहले सप्ताह से ही पाकिस्तानी इलाकों में हिन्दुओं के लिए सुरक्षा कहीं नहीं थी । आग लगने पर जैसे जंगली जानवर भागते हैं, वैसे ही हिन्दू भारत की ओर भागने लगे । भागने के लिए साधन नहीं थे । रेल स्टेशनों पर भगोड़ों की भीड़ थी, पर उन्हें ले जाने के लिए गाड़ियॉं नहीं थीं । लोग पैदल, साइकिल से, जैसे भी हो सके भारत की ओर चलते थे । बड़े-बड़े काफिलों में चलते थे, जिससे लुटेरे गिरोहों से बच सकें, पर बचते नहीं थे । हथियारबन्द गिरोह रात में तथा दिन में भी धावा बोलते थे और न केवल सामान, बल्कि जवान स्त्रियों को ले भागते थे । खाने को भोजन नहीं था । पानी था, पर पीने को नहीं । वर्षा होती थी, भिगोती थी । नदी-नाले उमड़कर बहते थे । रास्ता रोकते थे । भारत खबर पहुंची, तो घर-घर से रोटियां बनवाकर विमानों द्वारा पाकिस्तान में इन काफिलों के ऊ पर गिरवाई गई ।

at 7:13 AM
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Saturday, August 9, 2008
धर्म पर चलना ही कल्याण का मार्ग है
व्याख्याता - आचार्य डॉ. संजयदेव
मजहब, सम्प्रदाय, मत, पन्थ, मार्ग इन सभी को लोगों ने धर्म समझ लिया है। किन्तु ये धर्म नहीं हैं। इन सबको बनाने वाले और चलाने वाले मनुष्य हैं और ये सभी किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों की मान्यताओं के साथ कुछ जनसमूहों द्वारा अपनाए गए हैं। प्रायः उन सभी के पहले उन-उन सम्प्रदायों के संचालकों के नाम जुड़े हैं। जैसे कबीर पन्थी, दादू पन्थी, नानक पन्थी, वैष्णव सम्प्रदाय, रामानुज सम्प्रदाय, वल्लभ सम्प्रदाय, जैनमत, बौद्धमत, राधास्वामी, मुहम्मदी मजहब, ईसाई मजहब, आनन्द मार्गी आदि। धर्म तो वह है, जिसकी आवश्यकता समान रूप से समस्त मानव जाति को है। इसलिए धर्म का लक्षण "यतोऽभ्युदय निश्रेयससिद्धिःस धर्मः' ऐसा कहा गया है। अर्थात्‌ जिससे किसी विशेष वर्ग का नहीं, अपितु समस्त मानव जाति का अभ्युदय हो, उन्नति हो तथा जिसके द्वारा सारी मनुष्य जाति के दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति हो जावे, अर्थात्‌ मुक्ति (मोक्ष) हो जावे, वही धर्म है। इन दोनों बातों की कामना सृष्टि के समस्त मानव समाज को बनी रहती है। यदि धर्म के इस लक्षण को सभी समझ लें और मान लें, तो संसार के सारे झगड़े ही दूर हो जावें । वास्तव में धर्म तो झगड़ों को नष्ट करने वाला है। "धर्म' शब्द का अर्थ भी यही है- धारणाद्‌ धर्म इत्याहुः । सारा संसार जिसकी वजह से कायम रहता है, वही धर्म है। उदाहरण के लिए सत्य, धर्म का एक अंग है। सत्य के बिना संसार का कोई कार्य सुचारु रूप से नहीं चल सकता। सारे कार्य सत्य के सहारे ही होते हैं। असत्य भी सत्य का सहारा लेकर चलता है। सत्य वही है, जिसको आत्मा सत्य समझता है। केवल वाणी से कहा हुआ सत्य, सत्य नहीं माना जाना सकता। दूध में मिला हुआ पानी सत्य रूप का आश्रय लेकर के ही दूध की जगह बिक जाता है। झूठा मनुष्य भी सत्य की कसम खाकर ही असत्य को सत्य बनाने की कोशिश करता है। जिन व्यक्तियों में से, परिवारों में से, समाज से और राष्ट्र से सत्य उठ जाता है वे व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र नष्ट ही हो जाते हैं। इसीलिए कहा गया- नहि सत्यात्परो धर्मःनाऽनृतात्पातकं परम्‌। सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं और झूठ से बढ़कर संसार में कोई पाप नहीं है। झूठ का आश्रय लेकर यद्यपि लोग फलते-फूलते नजर आते हैं और संसार में बड़े-ठाट-बाट के साथ रहते दिखाई भी देते हैं, किन्तु यह स्थिति थोड़े समय ही रहती है। महर्षि मनु कहते हैं- अधर्मेणैधत्ते तावत्ततो भद्राणि पश्यति। ततः सपत्नान्‌ जयति समूलस्तु विनश्यति।। अधर्म करने वाला आदमी पहले खूब बढ़ता है। फिर उस सम्पत्ति से अनेक प्रकार के भोगों को भोगता है। उसके बाद धन की शक्ति से अपने शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त कर लेता है, किन्तु फिर समूल नष्ट हो जाता है।संसार में इस प्रकार के बहुत उदाहरण हैं, जिन्होंने झूठ बोलकर तथा बेईमानी से बड़ा धन कमाया, लोगों को मार करके भी धनी बन गये, किन्तु फिर वे संसार से ऐसे मिटे कि उन्हें कोई पानी देने वाला भी न रहा। वंश के वंश समाप्त हो गये। "अन्यायोपार्जितं वित्तं दशवर्षाणि तिष्ठति।' पाप और अन्याय से कमाया हुआ धन दस वर्ष ही टिकता है। कुछ इससे अधिक भी टिक जाता हो, तो आश्चर्य नहीं । किन्तु इसका अन्त में परिणाम कभी अच्छा नहीं निकलता। अन्त में तो-सत्यमेव जयते नाऽनृतम्‌। सत्य की ही जय होती है। इस समय हमारे समाज में असत्य का बड़ा बोलबाला है। हजारों व्यक्तियों में भी आपको कोई-कोई ही सत्यवादी नजर आयेगा। झूठ के बाद बेईमानी का नम्बर आ जाता है। बेईमानी करने के लिए ही आदमी झूठ का आश्रय लेता है। बाजार में आपको चीजों में प्रायः मिलावट मिलेगी। स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक वस्तुएँ भी खाद्य पदार्थों में मिला दी जाती हैं। दूध, घी, तेल आदि शुद्ध मिलने बड़े कठिन हो गये हैं। इसका ही परिणाम यह हुआ है कि लोगों को अनेक प्रकार की बीमारियॉं हो गई हैं और स्पष्ट दीख रही हैं। लोगों का जीवन भी कष्टमय होकर औषधियों के सहारे ही चल रहा है। यह सारा प्रताप असत्य का ही है। ऋषियों और महापुरुषों ने सत्य और अहिंसा को ही अपनाकर लोगों को असत्य और हिंसक वृत्तियों से दूर रहने का उपदेश दिया और "अहिंसा परमो धर्मः' के द्वारा अहिंसा को परम धर्म बताया, जो अष्टांग योग के प्रथम अंग का प्रथम शब्द ही है- अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः।वास्तव में जिससे अपना तथा दूसरों का कल्याण हो, वही धर्म है और धर्म पर चलना ही कल्याण का मार्ग है। धर्म और वेद के विषय में अधिक जानकारी के लिए तथा दिव्य वैदिक प्रवचन सुनने के लिये विजिट करें-
www.divyamanavmission.org

at 5:16 AM
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Wednesday, July 30, 2008
धर्म से ही नैतिकता सुरक्षित रह सकती है
प्रस्तुतकर्ता - आचार्य डॉ. संजयदेव
धर्म और ईश्वर का विरोध करने वाले लोग कहते हैं कि "" धर्म को मानने की क्या आवश्यकता है? धर्म को मानने वाले लोग धर्म का यही तो लाभ बताते हैं कि उससे हमारे अन्दर सत्य, न्याय, दया, तप-त्याग और उपकार आदि चरित्र सम्बंधी सद्‌गुण आ जाते हैं, जिन्हें हम अपने भीतर धर्म के बिना भी उत्पन्न पाए जाते हैं। हम अपने व्यवहार में इन सद्‌गुणों को चरितार्थ करते रहेंगे। हमें धर्म को मानकर आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक और कर्म-फल आदि के जंगल में पड़ने की क्या आवश्यकता है ?'' धर्म विरोधियों का यह कथन ऊपर से सुनने में रोचक प्रतीत होता है, परन्तु गहराई से विचार करने पर पता लगता है कि धर्म को माने बिना आत्मा-परमात्मा की सत्ता और लोक-परलोक तथा कर्म-फल के सिद्धांत को माने बिना चरित्र सम्बन्धी स्‌दगुण खड़े नहीं रह सकते। हमारी नैतिकता आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक तथा कर्म-फल के सिद्धान्त पर ही टिकी हुई है। यदि हम नास्तिक लोगों की बात मानकर भौतिकवादी बन जाएं और यह मानने लगें कि आत्मा नाम की कोई सत्ता नहीं है। जिसे हम आत्मा कहते हैं वह तो जड़ पदार्थों के संयोग का परिणाम है, तो हमारी नैतिकता ठहर न सकेगी। जब हमारा केवल यही जन्म है और इसी में हम चाहें कर लें तथा जो सुख भोगना चाहें भोग लें, तो हम में बुरे कर्मों से बचने की प्रवृत्ति न होगी। तब हमारे अन्दर यह प्रवृत्ति जाग उठेगीकि यह थोड़ा-सा जो समय हमारे पास है, इसमें हम जो सुख भोगना चाहें भोग सकते हैं। इसलिए जिस किसी तरह भी हमें अपने जीवन को सुखी बनाकर रखना चाहिए। इस प्रवृत्ति के वश में आकर हम अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए बुरे कर्म करने से भी नहीं चुकेंगे। बुरे कर्मों का दण्ड देने वाला परमात्मा तो कोई है नहीं, जिससे हमें अपने बुरे कर्मों का फल भोगना पड़े, तो हमें बुरे कर्मों से बचकर सच्चरित्र बनने की प्रेरणा क्यों होगी? आत्मा-परमात्मा की सत्ता, पुनर्जन्म और कर्म-फल सिद्धान्त को न मानकर केवल यही एक जन्म मानने की अवस्था में तो हमारा उद्देश्य केवल अपने इस वर्तमान जीवन को सुखी बनाना रह जोगा। तब हमें अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए झूठ, फरेब, धोखा-धड़ी और अन्याय, अत्याचार का भी अवलम्बन करना पड़े, तो वह कर लेना चाहिए। इस प्रकार के दुराचरणों से हमें क्यों रुकना चाहिए? भौतिकवादी नास्तिकों के पास इस प्रकार के प्रश्नों का कोई समाधान नहीं है। फिर एक बात और यहॉं विचारने की है। आत्मा और परमात्मा को न मानने की अवस्था में अच्छे और बुरे का भेद कैसे किया जा सकेगा? हमार किसी कर्म को अच्छा या बुरा कहकर उसकी अच्छाई और बुराई का निर्णय करने वाला कोई परमात्मा या आत्मा तो है ही नहीं। भौतिकवादी नास्तिकों के मत में परमात्मा की सत्ता तो बिल्कुल नहीं आत्मा की भी वास्तविक सत्ता नहीं। उनकी दृष्टि में आत्मा भी जड़ है। जिस आत्मा की कोई पृथक सत्ता नहीं है, जो हमारे शरीर के प्राकृतिक जड़ पदार्थों का ही एक गुण मात्र है और जड़ है वह आत्मा। हमारे कर्मों की अच्छाई और बुराई का निर्णय करने वाली कोई सत्ता न होने से हमारे कोई भी कर्म अच्छे या बुरे नहीं होंगे। हमारे सभी कर्म एक जैसे ही हो जायेंगे। हम जैसा चाहें कर लें। हम किसी के किसी कर्म को दुराचरण या अनैतिक और सदाचरण या नैतिक न कह सकेंगे। इसलिए धर्म के बिना नैतिकता खड़ी नहीं रह सकती। धर्म आत्मा का मानता है और परमात्मा को भी। आत्मा अपनी स्वतन्त्रता से अच्छे या बुरे कर्म करता है और अपने कर्मों का फल भोगने में परमात्मा के अधीन है। बुरे कर्म का फल दुःख और अच्छे कर्म का फल सुख मिलता है। कर्म फल का यह सिद्धान्त आत्मा को बुरे कर्मों से दूर रहने की प्रेरणा करता है। धर्म में परलोक और पुनर्जन्म के सिद्धांत को भी माना जाता है। यदि इस जन्म में हमें परमात्मा ने बुरे कर्मों का फल दुःख रूप में नहीं दिया है, तो वह अगले जन्म में देगा। उससे छूट नहीं सकते। अगले जन्म में भी फल मिल सकने का यह सिद्धान्त हमारे मन में बुरे कर्मों के प्रति और भी अधिक भय उत्पन्न कर देता है। इस भय के कारण यह दुराचरणों से बचकर सच्चरित्र रहने का यत्न करते हैं। ऐसा करते-करते हम स्वभाव से ही अच्छे आचरण करने वाले बन जाते हैं। परमात्मा के भय के कारण बुरे कर्मों से बचते रहने की बात हमारे मन की पृष्ठभूमि में बहुत नीचे पड़ी रहती है। धर्म सृष्टि के आरम्भ से इस प्रकार हमें नैतिकता सिखाता आ रहा है । धर्म द्वारा की जाने वाली अपनी इस सेवा के कारण संसार को धर्म का धन्यवाद करना चाहिए। जिस दिन संसार से धर्म को सर्वथा मिटा दिया जाएगा, जिस दिन लोग आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक को मानना सर्वथा छोड़ देेंगे, जिस दिन कर्म-फल सिद्धान्त में लोगों का विश्वास न रहेगा, जिस दिन परमात्मा की भक्ति द्वारा परमात्मा का विश्वास न रहेगा, जिस दिन परमात्मा की भक्ति द्वारा परमात्मा के गुणों को अपने भीतर धारण करने वाले धर्मात्मा सोग सर्वथा उत्पन्न होने बन्द हो जायेंगे, उस दिन संसार से सच्चरित्रता मिट जायेगी। आज लोगों में जो सच्चरित्रता दिखाई देती है, उसका मूल कारण धर्म ही है। नास्तिक लोगों में भी जो कुछ सच्चरित्रता दिखाई पड़ जाती है, उसका मूल स्त्रोत भी धर्म है। धर्म द्वारा सिखाए गए परम्परा से चले आ रहे सच्चरित्रता के तत्वों के आस्तिक लोगों ने स्वीकार किया है। जब धर्म न रहेगा, तो नैतिकता भी न रहेगी और संसार में अन्ध परम्परा चल पड़ेगी। कोई किसी को सन्मार्ग नहीं दिखा सकेगा। तब संसार में लोगों में मछली न्याय चल पड़ेगा। उस घोर अधर्म की अवस्था में न स्वतन्त्रता रहेगी और न किसी प्रकार की कोई उन्नति । परन्तु संसार यह सुनकर निश्चित रहे कि कपिल, कणाद, गौतम, वसिष्ठ, राम, कृष्ण, व्यास, शंकराचार्य, गुरु गोविन्दसिंह, समर्थ रामदास स्वामी, स्वामी दयानन्द तथा स्वामी रामतीर्थ जैसे समय-समय पर उत्पन्न होते रहने वाले धर्मनिष्ठ महापुरुषों की कृपा से वह बुरा दिन कभी न आने पाएगा। सच्चरित्र रहने के लिए हमें सच्चरित्र पुरुषोें की संगति की आवश्यकता पड़ती है। परमात्मा द्वारा हमें सबसे अधिक सच्चरित्र सत्ता की संगति प्राप्त होती रहती है। परमात्मा की उपासना द्वारा हमारे भीतर चरित्र सम्बंधी सद्‌गुण आ जाते हैं। इस प्रकार किसी भी दृष्टि से देखा जाए, चिन्तन-मनन करते-करते अन्त में नैतिकता का आधार धर्म को ही मानना पड़ता है।धर्म के बारे में अधिक जानकारी के लिये विजिट करें -www.divyamanavmission.org
at 7:34 AM
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Friday, July 18, 2008
वैदिक अध्यात्म द्वारा ही विश्वशान्ति
वैदिक अध्यात्म द्वारा ही विश्वशान्ति
प्रस्तुतकर्ता - आचार्य डॉ. संजयदेव
आजकल संसार में इतनी अशान्ति है कि न तो कोई शान्ति से बैठ सकता है और नाही दूसरों को शान्ति से बैठने ही देता है । उसका यही कारण है कि पाश्चात्य राष्ट्र आध्यात्मिकता शून्य कोरे भौतिकवाद में लिप्त हैं और यह सब विनाश मैं अर्थात्‌ अहम्भाव के कारण है । इसके परिणामस्वरूप संसार में आसुरी सम्पदा जाग उठी है । यह ललकार रही है, सबको कि आओ तो सही मेरे सामने कोई । सब कोई इस आसुरी संपदा से घबरा
उठे हैं।
आजकल संसार में जो मत्स्य न्याय चल पड़ा है, वह भी आसुरी वृत्ति का खेल है । जैसे एक बड़ी मछली अपने से छोटी मछली को निगल डालती है और दूसरी एक बड़ी मछली उन दोनों को निगल जाती है, इसी प्रकार रजोगुणी आसुरी वृत्ति में बंधे हुए राष्ट्र अपनी स्वार्थी गुटबन्दी से किसी को स्वतन्त्र नहीं रहने देना चाहते । रहो तो हमारे साथ रहो । नहीं तो हमारे साथ न रहने से पिस जाओंगे । यही उनका सन्देश है छोटे -छोटे राज्यों को । इस प्रकार संसार का समस्त राष्ट्र समुदाय गुटबन्दी में फंसता जा रहा है ।
फिर भी संसार अब समझने लग गया है कि केवल विज्ञान के नये -नये आविष्कारों के बल पर सर्वशक्तिमान नहीं बना जा सकेगा । संसार में सबसे बड़ी शक्ति है, वह अदृश्य शक्ति जो क्षणार्द्ध में समस्त अस्त्र-शस्त्रों के आविष्कारों को छिन्न भिन्न कर सकती है । विज्ञान द्वारा आविष्कृत महामारक अस्त्र स्वयं विज्ञानियों का ही विनाश कर देंगे । इसलिये सच्ची शान्ति का उपाय है -आत्मवत्‌ सर्व भूतेषु पश्यति स पश्यति ।
यदि भारत संभल जाये और अपनी विद्या, संस्कृति, सभ्यता से काम लेने लगे तो उसमें संसार को शान्ति धाम बनाने की शक्ति है । सारा संसार मुंह ऊ पर उठाये हुये भारत की ओर देख रहा है कि भारत पाश्चात्य भौतिकवाद का अपनी आध्यात्मिकता के साथ कैसे मेल बैठाता है । यदि भारत भौतिकता में आध्यात्मिकता का प्रवेश करा सका, तो संसार पुन: भारत को गुरु मानकर उसके पीछे चलने को तैयार हो जायेगा । और यदि भारत स्वयं ही अपनी आध्यात्मिकता को छोड़कर अथवा भूलकर केवल पाश्चात्य भौतिकवाद के कीचड़ में फंस जाएगा, तो संसार के लिये यह बड़ी दुर्घटना बन जाएगी, जैसी कि आज बन गई है । क्योंकि संसार के सभी राष्ट्रों में सच्ची शान्ति का उपासक भारत के अतिरिक्त और कोई नहीं है तथा नाही कोई और हो सकता है । इसीलिए हम वेद के शान्ति सूक्त के शब्दों में कहना चाहते हैं कि सा मा शान्ति रेधि, हे प्रभो ! संसार के कल्याण के लिए वह शांति मुझको मिले, बढे, मेरी रक्षा करे और संसार को भी अशान्ति से बचाये रखे ।
महायुद्धों से बचने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ बना हुआ है । पर वह भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो रहा । अभी यहॉं वर्ण भेद नहीं मिटा । अभी यहॉं काला-गोरा भाव नहीं मिटा । इस प्रकार प्रबल राष्ट्रों की सदैव के लिए प्रबल बने रहने की लालसा और अपने राष्ट्र के स्वार्थों के कारण अशान्ति मची हुई है । सब राष्ट्र शान्ति की बातें करते हैं और सभी अशान्ति के बीज बोते जाते हैं । संहारक अथवा मारक अस्त्र-शस्त्रों के घटाने की घोषणा करते हैं और साथ-साथ इनका निर्माण भी करते जाते हैं । तब शान्ति कैसे हो ?तो समाधान क्या ?
जब तक संसार में वैदिक धर्म प्रतिपादित सच्ची शान्ति का प्रचार न किया जायेगा, तब तक संसार सुख समाधान से बिल्कुल नहीं बैठ सकेगा ?
महाभारत कें शान्ति पर्व में जिस धर्म का वर्णन आया है । वह है- आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्‌ ।। जिस बात को हम स्वयं प्रतिकूल समझते हैं, उस प्रकार का प्रतिकूल व्यवहार हम दूसरों के साथ भी न करें ।
यदि मनुष्य परस्पर व्यवहार में इस बात का ध्यान रखें और जाति, समूह, वर्ग, राष्ट्र भी सामुदायिक रूप से इस बात ध्यान रखें, तो फिर संसार में अशान्ति नहीं रह सकती । पर यह होने के लिए आत्मतुल्यता का भाव रखना होगा, तभी यह सम्भव है । और एक महत्वपूर्ण बात कही गई है वह यह कि- यदन्यैषां हितं न स्यात्‌ आत्मन: कर्म पौरुषम्‌ ।
अर्थात्‌ अपना कोई कर्म अथवा पुरुषार्थ दूसरों के हित में ठीक नहीं बैठता, तो उस कर्म और पुरुषार्थ को प्रयत्नपूर्वक छोड़ दें । सारांश यह केवल व्यक्ति का धर्म नहीं अपितु समाज धर्म भी है, राष्ट्रधर्म भी है । वर्तमान में संसार कें सभी राष्ट्रों में संकुचित राष्ट्रीयता समा गई है । इसीलिए संकुचित दृष्टि से काम हो रहा है । यह जो संकुचित राष्ट्रवाद है, वह भी अशान्ति का मुख्य कारण है।
कोरा भौतिकवाद (अध्यात्मशून्य) राष्ट्रवाद न जाने उन राष्ट्रों को किस गढे में ले जा रहा है ? वैदिक अध्यात्मवाद के बिना यह अज्ञान कभी दूर न हो सकेगा और नाही संसार में सच्ची शान्ति प्रसारित होगी । इसलिए पुन: वेद के शब्दों में हम कामना करते हैं कि वही शान्ति हमें मिले, हममें रहे, हममें बढे और हममें पले ।
वेदों के विषय में अधिक जानकारी के लिये विजिट करें- http://www.divyamanavmission.org/

at 7:23 AM
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Thursday, July 17, 2008
आचार्य डॉ. संजयदेव का परिचय
आचार्य डॉ. संजयदेव का परिचय
पिता कैप्टेन केदारसिंह तथा मॉं श्रीमती ब्रह्मादेवी के पुत्र के रूप में हरियाणा प्रान्त के भिवानी जिला के ग्राम दातौली में 20 जुलाई 1966 को जन्म। प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही स्कूल में तथा हाई स्कूल की शिक्षा पास के गॉंव में हुई। 1980 में मीनाक्षीपुरम धर्मान्तरण काण्ड से विशेष उद्वेलित होकर आजीवन भारत माता की सेवातथा वैदिक धर्म का कार्य करने की भावना से वेद, वैदिक संस्कृति, संस्कृत एवं भारतीय इतिहास का विशेष अध्ययन किया। शास्त्री-संस्कृत स्नातक तथा एमए संस्कृत एवं आचार्य की शिक्षा रोहतक और जयपुर से प्राप्त की। वेदों का विशेष अध्ययन एवं विशेषज्ञता होने के कारण आगे चलकर 2001 में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इन्दौर (म.प्र.) से "वेदों में पर्यावरण" विषय पर डॉक्टरेट कीउपाधि प्राप्त की।
1986 से 1988 तक "शराबबन्दी संघर्ष समिति' के सम्भाग संयोजक तथा "हरियाणा नवयुवक सभा' के संयोजक के रूप में कार्य किया। लगभग 5 वर्षों तक विभिन्न संस्कृत विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। 2001 में वैदिक संस्कृति के पुनरुत्थान एवं मानवसेवा के उद्देश्य से 'दिव्य मानव मिशन' की स्थापना की। 2002 में धार्मिक सामाजिक चेतना के मासिक पत्र "दिव्ययुग' का इन्दौर से प्रकाशन प्रारम्भ किया, जो निरन्तर जारी है।
27 सितम्बर से 3 अक्टूबर तक इन्दौर में विश्व की पहली वेदकथा सम्पन्न की। वेद एवं भारतीय संस्कृति के दिव्य विचार जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से वेदकथा, रामकथा, उपनिषद कथा, गीताकथा एवं धार्मिक-आध्यात्मिक सत्संग तथा वैदिक प्रबन्धन और वैदिक पर्यावरण विषय पर व्याख्यान प्रवचन निरन्तर जारी।
at 7:07 AM
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Saturday, July 12, 2008
दिव्य मानव मिशन के संस्थापक आचार्य डॉ. संजयदेव के क्रान्तिकारी वैदिक विचार
ओ3म्‌ भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदस्तपोदीक्षामुप निषेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसंनमन्तु।।

अथर्ववेद 19.41.1

(भद्रम्‌) सुख और कल्याण को (इच्छन्तः) चाहते हुए (स्वर्विदः) स्वर्गीय जीवन वाले (ऋषयः) ऋषियों ने (अग्रे) पहले (तपः) तप और (दीक्षां) दीक्षा की (उपनिषेदु) शरण ली। (ततः) उसके बाद (राष्ट्रम्‌) राष्ट्र, (बलं) राष्ट्रीय बल, (य) और (ओजः) राष्ट्रीय ओज (जातम्‌) पैदा हुए। (तत्‌) इसलिये (देवाः) हे देव जनो! (अस्मै) इस राष्ट्रभाव, राष्ट्रीय बल और राष्ट्रीय ओज को (उप) प्राप्त करो और (संनमन्तु) एक होकर इसे नमस्कार करो।
यह मंत्र राष्ट्रीय भावों का वर्णन करता है। राष्ट्र के मूलभूत सिद्धान्त इस मंत्र में हैं।
ततो राष्ट्रम्‌ । राष्ट्र का भाव अपने आप नहीं होता। राष्ट्र भाव पैदा किया जाता है। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य अपने-अपने कर्त्तव्यों को समझते हैं। अतः वे अनधिकार चर्चा नहीं किया करते हैं। अतः उस समय "हम एक राष्ट्र के हैं' ऐसा भाव जाग्रत ही नहीं हो सकता। धीरे-धीरे जब मानव की निकृष्ट प्रकृति उसकी उत्तम प्रकृति को दबा लेती है और मानव लोभवश तथा स्वार्थवश होकर अनधिकार चर्चा करने लगते हैं, तब एक संगठन सूत्र में बंधने की आवश्यकता पड़ती है, जिससे कि वे अपने रिपुओं से अपनी रक्षा कर सकें। तब राष्ट्रभाव की जागृति होती है।
जातम्‌ । मन्त्र में यह स्पष्ट बतलाया गया है कि राष्ट्रभाव पैदा किया जाता है। यह कोई नित्य वस्तु नहीं है। उसी जमीन, उन्हीं मनुष्यों के होते हुए भी एक समय में उस मानव समुदाय को हम राष्ट्र कह सकते हैं और एक समय में नहीं भी कह सकते। जमीन राष्ट्र नहीं, मनुष्यों का जत्था राष्ट्र नहीं, एक जाति के मनुष्य राष्ट्र नहीं । अपितु राष्ट्र एक और ही वस्तु है जो इन मनुष्यों में पैदा की जाती है। उस वस्तु के होने पर उसी जमीन पर रहने वाला वही मनुष्यों का जत्था राष्ट्र पद से कहलाने योग्य हो जाएगा । जमीन और मनुष्यों के होते हुए भी एक देश अराष्ट्र में परिवर्तित हो सकता है। राष्ट्र का होना तद्देशवासियों की अभिलाषा-शक्ति और कृति शक्ति पर निर्भर है।
यहॉं प्रश्न उत्पन्न होता है कि देश को राष्ट्र रूप में परिवर्तित करने के लिए किस वस्तु की आवश्यकता है ! इसका उत्तर स्वयं मन्त्र बता रहा है।
उद्देश्य की प्राप्ति के लिये चाहे कितने ही कष्ट हों उन्हें सहना और खुशी से सहना यही तप है। यदि हम देश को राष्ट्र में परिवर्तित करना चाहते हैं तो इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये हमें चाहे जितने भी कष्ट आवें, उन्हें हम खुशी से सहन करें और धैर्य धारण कर उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये हम पग आगे बढ़ाते जावें, यही तप है। तप में सहने का भाव आता है न कि मारने का। दीक्षा का अर्थ है व्रत तथा नियम। तप भूमि तैयार करता है व्रत तथा नियम के लिए । अतपस्वी व्रती नहीं हो सकता है। उदाहरणार्थ हमने अपना उद्देश्य बना लिया है कि हम अपने राष्ट्र की सेवा करेंगे। इसमें चाहे जितने कष्ट आवें हम उनको प्रसन्नतापूर्वक सह लें। यही हमारा तप होगा। परन्तु इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये हमें कुछेक व्रत भी धारण करने पड़ेंगे तथा कुछ नियम भी। इन व्रतों और नियमों का धारण करना तथा इनके पालन में दृढ़ रहना यही दीक्षा है।
ऋषयः । देश के मुखिया तथा पूर्ण सदाचारी और दूरदर्शी लोगों को अपना वैयक्तिक सुख छोड़कर अग्रसर होना देश को राष्ट्र में परिवर्तित करने के लिये आवश्यक शर्त है। इसी शर्त को दिखलाने के लिये ही इस मंत्र में "ऋषयः स्वर्विदः' ये दो पद दिए गए हैं। ऋषि उन लोगों को कहते हैं जो कि भविष्य को देखने वाले होते हैं, जो कि युक्ति तथा अनुभव के द्वारा ही नहीं अपितु अपनी आत्मिक शक्ति द्वारा साध्य वस्तु के तत्व को जान लेते हैं। स्वर्विदः का अर्थ है, वे मनुष्य जिन्होंने कि अपने कर्मों द्वारा इसी देह में स्वर्ग प्राप्त कर लिया है, जिनका जीवन इस मृत्यलोक पर भी स्वर्गीय है। ये लोग सदाचार के आदर्श होते हैं। जब तक ये ऋषि जो कि स्वर्गीय जीवन के आनन्द में मग्न हैं, अपने वैयक्तिक स्वर्गीय आनन्द को त्यागकर देश के सामुदायिक आनन्द को अपना आनन्द नहीं समझते, तब तक किसी देश का राष्ट्र रूप में परिवर्तित हो जाना असम्भव है।
भद्रम्‌। राष्ट्रभाव क्यों पैदा करना चाहिए? राष्ट्रभाव के क्या लाभ हैं ! इसका उत्तर "भद्रमिच्छन्तः' पदों द्वारा दिया हैगया । "भद्र' शब्द के दो अर्थ होते हैं- सुख और कल्याण। सुख से अभिप्राय अभ्युदय का है और कल्याण से निःश्रेयस का। अभिप्राय यह हुआ कि प्रेय और श्रेय दोनों मार्गों की सिद्धि राष्ट्रीय भाव के बिना नहीं हो सकती। अतः इस लोक और परलोक का सुधारना ही राष्ट्र भाव का फल है। यह निश्चित हुआ।
बलमोज । जनता या देश जब राष्ट्र बन जाता है तब ही उस जनता या देश में राष्ट्रीय बल और राष्ट्रीय ओज पैदा होता है। जो देश राष्ट्र में परिणत नहीं हुआ उस देश में राष्ट्रीय बल और राष्ट्रीय ओज पैदा नहीं हो सकता। हाथी में बल है और शेर में ओज है। राष्ट्र जब अपने सैन्य, बुद्धि तथा कोष के बल से अपने शत्रुओं पर विजय पा लेता है, तब उस राष्ट्र में एक विशेष प्रकार का ओज पैदा हो जाता है। प्रत्येक स्वतन्त्र देश के व्यक्तियों में यह ओज हुआ करता है। एक पहलवान में बल तो है, परन्तु उसके सम्मुख खड़े हुए एक स्वतन्त्र देश के बालक में ओज है। इस ओज के प्रताप से वह पहलवान बलशाली के दम को भी खुश्क कर देता है। बल और ओज में यही अन्तर है।
देवाः। अतः देश के सभी देवों का यह कर्त्तव्य है कि वे इस राष्ट्रभाव की प्राप्ति के लिए उद्योग करें। क्योंकि देव नाम विद्वान्‌ लोगों का है। समाज के ये ही मुखिया हुआ करते हैं। जब तक मुखिया लोग आगे नहीं बढ़ते तब तक जनता भी आगे नहीं बढ़ती। जनता को उत्साह देने वाले तथा उसके मार्गदर्शक देव लोग ही होते हैं। अतः देवों का कर्त्तव्य है कि वे राष्ट्र भाव की प्राप्ति के लिये अवश्य उद्योग करें और राष्ट्र भाव, राष्ट्रबल तथा राष्ट्र के सामने शीश नमावें। ऋषि कोटि के लोग तो राष्ट्रभाव के प्रवर्तक होते हैं। ये ऋषि देवों को रास्ता दिखा देते हैं और तत्पश्चात्‌ ये देव लोग साधारण जनता के मार्गदर्शक होते हैं।
सम्‌। जनता में राष्ट्रभाव के गौरव को बढ़ाने के लिये यह आवश्यक है कि देवों में परस्पर मतभेद न हो। यदि राष्ट्रभाव के फलाफल के विचार में परस्पर मतभेद है तो जनता वास्तविक रूप से राष्ट्रभाव के महत्व को न जान सकेगी । अतः जहॉं तक हो सके देश के देवों में राष्ट्रभाव सम्बन्धी मतभेद नहीं होने चाहिएं। देश के सभी देवों को मिलकर राष्ट्रभाव की उन्नति में सहयोग देना चाहिए। यही मन्त्र में "सम्‌' पद का अभिप्राय है।श्र
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आचार्य डॉ. संजयदेव का परिचय

डॉ. संजयदेव
Indore, Madhya Pradesh, India
पिता कैप्टेन केदारसिंह तथा मॉं श्रीमती ब्रह्मादेवी के पुत्र के रूप में हरियाणा प्रान्त के भिवानी जिला के ग्राम दातौली में 20 जुलाई 1966 को जन्म। प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही स्कूल में तथा हाई स्कूल की शिक्षा पास के गॉंव में हुई। 1980 में मीनाक्षीपुरम धर्मान्तरण काण्ड से विशेष उद्वेलित होकर आजीवन भारत माता की सेवातथा वैदिक धर्म का कार्य करने की भावना से वेद, वैदिक संस्कृति, संस्कृत एवं भारतीय इतिहास का विशेष अध्ययन किया। शास्त्री-संस्कृत स्नातक तथा एमए संस्कृत एवं आचार्य की शिक्षा रोहतक और जयपुर से प्राप्त की। वेदों का विशेष अध्ययन एवं विशेषज्ञता होने के कारण आगे चलकर 2001 में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इन्दौर (म.प्र.) से "वेदों में पर्यावरण" विषय पर डॉक्टरेट कीउपाधि प्राप्त की। 1986 से 1988 तक "शराबबन्दी संघर्ष समिति' के सम्भाग संयोजक तथा "हरियाणा नवयुवक सभा' के संयोजक के रूप में कार्य किया। लगभग 5 वर्षों तक विभिन्न संस्कृत विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया।
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