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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

जीवन और मृत्यु परमात्मा के अधीन‌

जीवन और मृत्यु परमात्मा के अधीन
लेखक - आचार्य अभयदेव विद्यालंकार

ओ3म्‌ त्वं च सोम नो वशो जीवातुं न मरामहे।
प्रियस्तोत्रो वनस्पतिः ।। ऋग्वेद 1.91.6

ऋषिः राहूगणो गोतमः।। देवता सोमः।। छन्दः गायत्री।।

विनय- हे हृदयेश ! हे देव ! हे सोम ! जब तुम्हारी इच्छा हमें जीवित रखने की है तब हमें कोई मार नहीं सकता। यह अन्धा, अज्ञानी इंसान बहुत बार तेरे भक्तों से द्वेष करने लगता है, उन्हें सताता है और उन्हें मारना तक चाहता है। भक्त प्रह्लाद को मारने की कितनी चेष्टाएँ की गई! भक्त मीरा की जान लेने के लिए राजा ने कई बार यत्न किया, भक्त दयानन्द को लोगों ने कई बार जहर दिया। पर तेरी इच्छा के बिना कौन मर सकता है ? भक्त लोग इस तत्व को जानते होते हैं, अतः वे आनन्दित रहते हैं। मरने से डरने वाला यह संसार, तेरे ईश्वरत्व को न जानने वाला यह संसार यों ही भयत्रास और मरणाशंका से मरा जाता है। पर भक्त देखते हैं कि जब तक तेरी इच्छा नहीं है तब तक उन्हें कोई मार नहीं सकता। और जब तेरी इच्छा होगी तब तो मरना भी उनके लिए उतना ही आनन्ददायक होगा जितना कि तेरी इच्छा से जीना आनन्ददायक है। ओह, इस ज्ञान के कारण वे भक्त जीवित ही अमर हो जाते हैं, अभिनिवेश के क्लेश से पार हो जाते हैं। वे संसार की किसी भयंकर से भयंकर वस्तु से भी न डरते हुए, तेरे स्तोत्र गाते हुए निर्भय फिरते हैं। प्यारे स्तोत्रों से तुझे रिझाना या तेरे स्तुतिगान से जगत्‌ में भक्ति का प्रसार करना, यही उनका कार्य होता है। अपनी रक्षा व अरक्षा की चिन्ता वे तुझ पर छोड़ बेफिक्र हो जाते हैं। तू तो भजन करने वालों की रक्षा करने वाला मौजूद ही है, तो उन्हें क्या चिन्ता? आह! कैसी बेफिक्री और निरापदता की अवस्था है! अमृत्युता (अमरता) का कैसा आनन्द है!

शब्दार्थ- सोम=हे सोम ! त्वं च=तुम यदि नः=हमारे जीवातुम्‌=जीवित रहने की वशः=इच्छा करते हो तो न मरामहे=हम पर नहीं सकते। प्रियस्तोत्रः=तुम प्रिय स्तोत्रवाले हो और वनस्पतिः=भजन करने वालों के रक्षक हो।l

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ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति:

आर्यसमाज, जामनगर के प्रधान श्री धर्मवीर खन्ना के निधन का समाचार पढ़कर ऐसा लगा
कि जैसे आर्यसमाज के सक्रिय सहयोगी से हम वंचित हो गये हैं, आर्यसमाज, जामनगर का
नाम बहुत प्रसिद्ध हो चुका है, वेदों को वेब सा‍ईट के माध्यम से घर घर पहुँचाने में आर्यसमाज
जामनगर का नाम अग्रणी है और एक सक्रिय सहयोगी इस आर्यसमाज को अन्यों के सहारे
छौड़ गया है, आशा है यह आर्यसमाज उसी प्रकार वेद प्रचार करती रहेगी |

जन्म और मृत्यु परमात्मा के अधीन है अब शोक नहीं दिवंगतात्मा के महान कार्यों को
सक्रिय रखने की प्रेरणा प्राप्त करके और भी प्रगती करनी है | मुझे "शोक" शब्द अख‌रता है
क्योंकि "शोक" शब्द का अर्थ होता है "किन्हीं पाप कर्मों का फल"| कभी भी "शोक सभा"
न रख कर "श्रद्धाँजलि व प्रेरणा सभा" और "शोक समाचार" नहीं निधन समाचार आदि|
परमात्मा हम सबों को शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करे कि हम दिवंगतात्मा से प्रेरणा प्राप्त
करके उनके द्वारा किये गये कार्यों को गति दें |

ओ३म् शान्ति:|

राजेन्द्र आर्य‌

ऋग्वेद का

ऋग्वेद का मन्त्र श्रद्धांजलि स्वरूप है |

राजेन्द्र आर्य‌