' क्रोध '

क्रोध कभी भी आ जाता है
बिना बुलाए, बिना बताए

न समय देखकर ही आता है
न रखता, मर्यादा का ध्यान

जब कुछ भी गड़बड़ हो जाती
क्रोध भाग कर झट आता है

लम्बे उसके पाँव बहुत हैं
आखें उसकी बहुत विकट हैं

उलझन जैसे ही दिखती है
झट्पट् वह उसमें घुसता है

पहले इससे सोच सकें हम
वार वह आकर कर जाता है

हो घायल उसके प्रहार से
युद्ध भयंकर बढ़ जाता है

बचना हो गर, तुम्हें क्रोध से
कवच औढ़ना होगा तुमको

रखना होगा बाहर मन से
द्वेष, ईर्ष्या दो बहनों को

यह कहना आसान बहुत है
बच पाना पर नामुमकिन है

जब तक, न शान्त मन
निर्मल होकर

प्रभू प्रेम में जाए डूब
और प्रभू से सतत प्रार्थना

मन के भीतर चलती जाए

योउस्मान् द्वेष्टी यं वयं
द्विष्मस्तं वो जम्भे दद्म:

तब तक, न राहत मुमकिन है
है आतंक विकट यह ऐसा

जिसकी साख बहुत गहरी है।।