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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : मन्त्र मधुर‌

मन्त्र मधुर
एहयू षु ब्रवाणि तेSग्न इत्थेतरा गिर:|
एभिर्वर्द्धास इन्दुभि:|| साम ७०५ ||

मन्त्र मधुर हैं सदा सुखद हैं, जीवन ऐसा मधुर बनाओ|
प्रभु जीवन में ऐसे आओ, मधुर रस घट लेकर छा जाओ||

परमेश तुम्हारा वर्णन हो,
या इतर प्रकृति उच्चारण हो,
सृजन मधुरता जग में आये
शब्दों में श्रुति का दर्शन हो|

मधुर शब्द में सत्य सजाओ, शब्द स्वस्थ सौन्दर्य बनाओ|
प्रभु जीवन में ऐसे आओ, मधुर रस घट लेकर छा जाओ||

यही मधुरता सहित सत्यता,
लाती है जीवन में दृढ़ता,
शोभा शीतलता बढ़ती है
जग में बढ़ती प्रीति प्रखरता|

शुभ कर्म हाथ में यदि लाओ, तो प्रभु को स्वयं साथ पाओ|
प्रभु जीवन में ऐसे आओ, मधुर रस घट लेकर छा जाओ||

तुम मन्त्रों को मधुर बोलतै,
श्रोताओं में शहद घोलते,
नित्य जगत की बातचीत में
तुम कितना आचरण तोलते|

कर्म गिरा गरिमा से गाओ, प्रभु की महिमा को फैलाओ|
प्रभु जीवन में ऐसे आओ, मधुर रस घट लेकर छा जाओ||

आर्य

आर्य राजेन्द्र
Submitted by Rajendra P.Arya on Wed, 2013-04-24 07:52. भजन/कविता
ओम् ओम् कौह (पथिक भजनोपहार )
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह !
छड के कुसंग सत्संग विच बौह !
अपनेंयां पैरां नू संभाल रखना !
माडे पासे जाण न ख़याल रखना !
पानियाँ ने मंजिला ते सिधे राहे पौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह !......
चंगे चंगे कम हथां नाल करिये !
जेहडा कम करिये कमाल करिये !
हस के मुसीबतां नूं सिर उत्ते सौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह......
जग ते बेशक रंग कई वेखणा !
अखियाँ दे नाल सदा सही वेखणा !
कन्नां नूं बुराई तों बचा के रख लौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह .....
निकी जिन्नी गल दा पहाड़ वेखेया !
बने होए कम्मा दा विगाड़ वेखेया !
एहदे नालों चंगा ए “पथिक” चुप रौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह....

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
8699658336
9041342483