' अट्पटा जगत '
Submitted by AnandBakshi on Fri, 2008-03-14 14:57.
भजन/कविता
जगत अटपटा हमने देखा
भाग रहे हम हरदम ऐसे
सीँग गधे के सिर से जैसे
नहीं ठिकाना कोई अपना
कहते है हम किसको अपना
जोड़ रहे हम जिस झोले में
उसकी पैदी फटी हुई है
भोग न कर पायेंगे उसका
चाहत जिसकी लगी हुई है
बहुत खबर हम रखते जग की
अपनी तो पर पता नहीं है
छूट जाए कब गाड़ी अपनी
पल भर की भी खबर नहीं है
फिर भी कहते खुद को मालिक
कौन है मालिक पता नहीं है
प्रभु की मूरत सभी बनाते
प्रभु का ठेका हैं सब लेते
पर प्रभु आदेश् जो देते
ध्यान तनिक न उस पर देते।।
