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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : प्रभु सारथी

प्रभु सारथी :

ओ३म् इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिर: |
रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिं पतिम् || साम ३४३ ||

प्रभु बने सारथी इस रथ के, उनको पकड़ा दी जब लगाम |
लालित्य जीव को मिल जाये, आनन्द मोक्ष तो पूर्ण काम ||

वेद तुम्हारा गायन करते,
भले अपरिमित सीमित रहते,
भले समुद्र असीमित दिखता
इन सब से पेअभु बृहत ठहरते |

गगन गर्जना सिन्धु वन्दना, पक्षी करते कलरव ललाम |
लालित्य जीव को मिल जाये, आनन्द मोक्ष हो पूर्ण काम ||

हो कंठ क्षीण या शक्तिवान,
हो प्रभु गायन गुञ्जायमान,
गायनवत हो लोक आचरण
मिल जाये मनुज को वर विहान |

जन जन में आये सज्जनता, तो पति रक्षक ले हाथ थाम |
लालित्य जीव को मिल जाये, आनन्द मोक्ष हो पूर्ण काम ||

गति शक्ति ज्ञान संरक्षक पति,
तप त्याग प्रभा प्रति प्रेरक पति,
सद्‍भाव पूर्ण सत्कर्म व्रती
ईश्वर जन मानस के सत्पति |

हम युद्ध भूमि में जय पायें, कर कर्म भूमि में प्रभु प्रणाम |
लालित्य जीव को मिल जाये, आनन्द मोक्ष हो पूर्ण काम ||

(सामवन्दना : पं. देव नारायण भारद्वाज) से साभार : राजेन्द्र आर्य‌