Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : यश: स्त्रोत‌

यश: स्त्रोत

यशो मा द्दावापृथिवी यशो मेन्द्रबृहस्पती | यशो भगस्य विन्दतु यसो मा प्रति मुच्यताम् यशस्व्या ३स्या: संसदो5हं प्रवदिता स्याम ||साम ६११ ||

जिससे यश तथ्य सुरक्षित हो, दो संसद में वक्त‌व्य वही |
कुछ और रहे या रहे नहीं, प्रभु यश मेरा चुक जाये नहीं ||

पृथ्वी अपना यश धीरज दो,
तप तेजोमय यश सूरज दो,
दो इन्द्र मुझे यश शक्ति पुञ्ज
सुयश बृहस्पति विद्दा- रज दो |

सतत सुयश ऐश्वर्य बढ़ाये, समृद्धि न मद भर जाय कहीं |
कुछ और रहे या रहे नहीं, प्रभु यश मेरा चुक जाय नहीं ||

हो देह भूमि दृढ़ता वाली,
हो बुद्धि सूर्य सी उजियाली,
प्रभु इन्द्र क्षत्र संरक्षक हो
गुर परम ब्रह्म शिक्षा शाली|

प्रभु के अनन्त गुण वैभव से, कुछ मुज को गुण मिल जाय यही|
कुछ और रहे या रहे नहीं, प्रभु यश मेरा चुक जाय कहीं ||

ऐश्वर्य, वीर्य, श्री, कीर्ति कहाँ,
श्रुति- ज्ञान और वैराग्य जहाँ,
इस बट रस के भग सागर से
प्रभु करदो कुछ बौछार यहाँ |

कृति- कीर्ति नीति सम्बन्धन से, हो संसद में सौजन्य सही|
कुछ और रहे या रहे नहीं, प्रभु यश मेरा चुक जाय नहीं ||

(सामवन्दना : पं.देव नारायण भारद्वाज )