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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : षट् ऋतु- जीवन‌

सामवन्दना : षट् ऋतु- जीवन‌

वसन्त इन्नु रन्त्यो ग्रीष्म इन्नु रन्त्य|
वर्षाण्यनु शरदो हेमन्त: शिशिर इन्नु रन्त्य || साम ६१६ ||

यह षट् ऋतु के वर्णन वाला, श्रुति साम मन्त्र मधु का प्याला|
प्रभुवर ने अनुपम‌ क्रम डाला, नित्य नया आनन्द निराला ||

कितन रमणीक वसन्त बना, रमणीक ग्रीष्म भी है कितना |
हैं दिवस रसीले वर्षा के, रमणीक शरद भी है कितना ||

हेमन्त सन्त सा सम्मोहक, रमणीक शिशिर भी है कितना |
एक दिवस ऋतु काल एक क्या, रमणीक वर्षा ही है अपना ||

हर वर्ष हर्ष आ हरियाला, प्रभु उत्साह बढ़ाने वाला |
प्रभुवर ने अनुपम क्रम डाला, नित्य नया आनन्द निराला ||

मधुमास सुहाना आने पर, जग सृजन शील हो जाता है |
बल ग्रीष्म ऊर्जा के द्वारा, अभिनव विकास वह पाता है ||

रसमय हो वर्षा के समान, अनुराग बिखरता जाता है|
हो शान्त शरद सा मर्यादित, हेमन्त पक्वता लाता है||

होशिशिर शीर्ष यश वाला, दे आत्म त्याग तन की शाला|
प्रभुवर ने अनुपम क्रम डाला, नित्य नया आनन्द निराला ||

शैशव वसन्त सा बाल्यकाल, गर्मी सी होती तरुणा‍ई|
रसधार बहाने योवन की, फिर जीवन में वर्षा आ‍ई|
शरद प्रौढ़ता समझ बढ़ाये, हेमन्त बढ़ाये सुगढा‍ई|
शिशिर शिष्ट यश वृद्ध घना, पतझड़ सी हो सहज विदा‍ई|
छओं दिशा श्रुति का उजियाला, किस किसने जीवन में डाला|
प्रभुवर ने अनुपम क्रम दला, नित्य नया आनन्द निराला ||