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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : प्यार असाधारण‌

प्यार असाधारण

ओ३म् प्रत्यङ् देवानां विश: प्रत्यङ् उदेषि मानुषान् |
प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे || साम ६३६ ||

पा गए साथ विद्वानों का, बस उनमें ही मत रमजाओ |
साधारण जन जब साथ चलें, तब प्यार असाधारण पाओ ||

विद्वान दिव्य गुण वाले हैं,
जीवन जिनके उजियाले हैं,
तुम उनके सम्मुख जब जाओ
तब मिलते, ज्ञान निराले हैं |

प्रत्यक्ष मनीषी के होकर, प्र्त्यक्ष मनीषा को पाओ |
साधारण जन जब साथ चलें, तब प्यार असाधारण पाओ ||

जो ताप- तिमिर में अटक रहे,
कितने ही मानव भटक रहे,
प्रजा जनों के सम्मुख जाओ
जो पतन गर्त में लटक रहे |

उनके प्रत्यक्ष प्रकाश करो, विद्दा दे व्यवहार बनाओ |
साधारण जन जब साथ चलें, तब प्यार असाधारण पाओ ||

दीनों के दु:ख का क्षय होगा,
तब कहीं नहीं कुछ भय होगा,
परमेश् पिता की प्रियता में
सुख का प्रत्यक्ष उदय होगा |

सबकी उन्नति में निज उन्नति, प्रत्यक्ष नियम यह अपनाओ |
साधारण जन जब साथ चलें, तब प्यार असाधारण पाओ ||

(सामवन्दना : पं. देव नारायण भारद्वाज )

टं‍कणित:

राजेन्द्र आर्य‌

सामवन्दना

सामवन्दना के गीतानुवाद से आपके जीवन में भक्ति का रंग उमड़ेगा
कृपया इन्हें गुनगुनाते रहें और अपने जीवन में आनन्द का अहसास करें |

धन्यवाद |