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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : प्रभुवर ऐसा ही

प्रभुवर ऐसा ही

ओ३म् एव्प्रह्यो S३S३S व | एवां ह्यग्ने एवाहिन्द्र |

एवा हि पूषन् | एवा हि देवा: साम ६५० ||

भक्तों ने जैसा गाया है, जैसा स्तुतियों में वर्णित |
ऐसा ही है ऐसा ही है, प्रभुवर ऐसा ही है निश्चित ||

बालक नवयुवक ब्रह्मचारी,
उन में आती अग्नि तुम्हारी,
वही गृहस्थी में जा बसती
ऐश्वर्य इन्द्र की उजियारी |

बन वही वनस्थी का पूषन्, जग भर को कर देता पोषित |
ऐसा ही है ऐसा ही है, प्रभुवर ऐसा ही है निश्चित ||

देवत्व वही वैरागी में
ढ़लता प्रभु के अनुरागी में
दिव्यता लुटाता सन्यासी
घृत आहुति जैसे आगी में |

सन्तों को विमल वृतियाँ ही, करती समाज को सुख पूरित |
ऐसा ही है, ऐसा हि है, प्रभुवर ऐसा ही है निश्चित ||

अग्नि वही है इन्द्र वही है,
प्रभुवर पूषन् देन वही है
ज्ञान सुरक्षा विकास शोभा
देता सब आयाम वही है |

आधार प्यार उपकार सार करता उपचार वही अर्पित |
ऐसा ही है ऐसा ही है, प्रभुवर ऐसा ही है निश्चित ||