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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : जैसा तुमको अन्त चाहिये

ओ३म् यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम् |
तत्र योनिं कृणवसे || साम ७०६ ||

जैसी भावना बनाओगे |
तुम वैसी ही गति पाओगे ||

हम ऐसे पथिक निराले हैं,
युग युग से आने वाले हैं,
जरा ठहरना फिर चल पड़ना
अनन्त तक जाने वाले हैं |

तुम जैसी राह बनाओगे |
वैसी ही गति पाओगे ||

अन्त काल की क्या तैयारी,
कैसी है भावना तुम्हारी,
बस, उसी योनि में जाना है
यह जीव तुम्हारी लाचारी|

तुम जैसी मति अपनाओगे |
तुम वैसी ही गति पाओगे ||

जैसातुम को अन्त चाहिये,
विमल भाव कविकन्त चाहिये,
दक्षता शिशिर तक वैसी हो
जैसा तुमको बसन्त चाहिये |

जैसा अभ्यास बनाओगे |
तुम वैसी ही गति पाओगे ||