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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : प्रखर प्रेम‌

ओ३म् यज्ञा यज्ञा वो अग्नये गिरा गिरा च दक्षसे |
प्र प्रवयममृतं जातवेदसं प्रिय मित्रं न शंसिषम् ||साम ७०३||

हम को‍ई काम रचाते हैं, तुमसे पथ दर्शन पाते हैं |
प्रभु के पथ दर्शन में चलकर, सब काम सफल हो जाते हैं ||

जग में शुभ रचना करते हैं,
जिसमें उपकार विहँसते हैं,
अति छोटे हो या बहुत बड़े
वे कार्य यज्ञ ही रहते हैं |

यज्ञ अहिंसा सर्वोदय के, हम को कर्तव्य सिखाते हैं |
प्रभु के पथ दर्शन् में चलकर, सब काम सफल हो जाते हैं ||

मानव कनिष्ठ हो या वरिष्ठ,
हो वात नित्य की या विशिष्ट,
हैं कथन सभी के ध्यान योग्य
सुन समझ मनुज बनते बलिष्ठ |

उपदेश कर्म अभ्यास नित्य, हमको दृढ़ दक्ष बनाते हैं|
प्रभु के.......

यही दक्षता बने दिव्यता,
प्रभु प्यारे की वरे मित्रता,
सर्वज्ञ अमर प्रभु सहवर्तन
दे प्रखर प्रेम की पवित्रता |

तव सखा सखा की महिमा के, सुख से यश गीत सुनाते हैं |
प्रभु के पथ दर्शन् में चलकर, सब काम सफल हो जाते हैं ||