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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : क्रियाशीलता

ओ३म् इच्छति देवा: सुन्वन्तनं स्पृहयन्ति |
यन्ति प्रमादमतन्द्रा: ||साम ७२१ ||

है क्रियाशीलता में आशा|
व्रत कर्म देव की अभिलाषा ||

हो बहुत अधिक या थोड़ा हो,
निर्माण क्रिया को जोड़ा हो,
सतत परिश्रम करके जिसने
जग स्वर्ग बनाकर छोड़ा हो|

हो सबको इनसे प्रत्याशा |
व्रत कर्म देव की अभिलाषा ||

स्वप्नों में खोये रहते हो,
या अतिशय सोये रहते हो,
उन्हें देवता नहीं चाहते
जो पर मुख जोहे रहते हो |

जो फैलाते नहीं निराशा |
व्रत कर्म देव की अभिलाषा ||

जो तन्द्रा त्याग सजग होते,
उत्साह ज्योति जगमग होते,
नहीं प्रमादी वही प्रमोदी
उनके गति उन्नति पग होते |

जिनके कर्मठता की भाषा|
व्रत कर्म देव की अभिलाषा ||