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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Sanskrit and Arya Samaj

Sanskrit language is derived from the Vedas. The Vedas are considered Divine knowledge. The Vedas are therefore source of both - knowledge as well as language. It is therefore quite obvious that the language designed by the Divine must be most scientific, most perfect and most rewarding.

Swami Dayananda's teacher Swami Virajananda, a blind monk with indomitable courage and will-power, was a great Sanskrit grammarian of his times and he was of the strong opinion that the Sanskrit must be encouraged by the rulers of the states. He taught Swami Dayananda the most important books of Sanskrit language viz. Ashtadhyayi and Maha-Bhashya authored by the great seers like Panini and Patanjali. These are the master pieces of the science of Sanskrit language. Maharshi Yaska's Nirukta and Nighantu are also most valuable.

Swami Dayananda thus made himself competent to decipher the Vedic verses. He also tried all along his life to popularize the Sanskrit language. He stipulated in the sub-rules of the Arya Samaj that the members of the Arya Samaj should know this language. He prepared a series of books on Sanskrit grammar known as "Vedang-Prakash", and wrote a special book "Sanskrit-Vakya-Prabodh" to encourage people to have communication in Sanskrit. He wrote his books like "Rigvedadi-Bhashya-Bhumika", "Veda-Viruddha-Mat-Khandan" etc. in both - Hindi as well as Sanskrit. In Northern India he opened a few schools for the revival of the Sanskrit language and Vedic study.

Initially the members of the Arya Samaj took great interest in learning this language, but later on the interest got little diminished. Pandit Guru Datta Vidyarthi and Pandit Shyamaji Krishna Verma were expert in this language. One lecture delivered by the latter on "Sanskrit is not a dying language" on foreign land is highly popular. Pandit Guru Datta took Sanskrit classes to teach this great language to other interested. There were many other Arya scholars of Sanskrit before independence. Pt. Uthishthir Minansak was one of the most prominent Arya Samaji scholars who possessed profound knowledge of this ancient language. He wrote a great book in Hindi on "The History of Sanskrit Grammar". Still because of the various Gurukuls run by the Arya Samaj we have so many scholars well versed in this language. Besides Arya Samaj also there are many other groups and organizations doing commendable work for the propagation of Sanskrit. They all deserve support and congratulations.

We all should dedicate some time to learn and read Sanskrit, so that we can enjoy live connection to it. We all should know the fact that "Krinvanto Visham-Aryam" itself demands from one and all of us that we should have to have some knowledge about this ancient language.

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= Bhavesh Merja

सशक्त भाषा

सशक्त भाषा संस्कृत
लेखक- हरिदत्त शास्त्री

संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा है। इसे देववाणी भी कहते हैं। देव सदा स्वतन्त्र रहते हैं। वे परतन्त्र नहीं होते और न किसी को पराधीन रखना चाहते हैं। देव तो परतन्त्रों के बन्धन काटने का सफल प्रयास करते हैं। विश्व के साहित्य में सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में कहा गया है- उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।। (ऋग्वेद 10.137.1) देव तो गिरे को बार-बार उठाते हैं। 1857 की क्रान्ति का अग्रदूत प्रज्ञाचक्षु संन्यासी स्वामी विरजानन्द संस्कृत का उद्‌भट विद्वान था। तिलक, लाला लाजपतराय, मालवीय पर भी संस्कृत की अमिट छाप थी, जो स्वतन्त्रता की प्रथम पंक्ति के नेता थे।

व्यापक और जीवन्त भाषा- संस्कृत भाषा आज भी करोड़ों मनुष्यों के जीवन में ओतप्रोत है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक समस्त जनता के धार्मिक कृत्य संस्कृत में होते हैं। प्रातः जागरण से ही अपने इष्टदेव को संस्कृत भाषा में स्मरण करते हैं। गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि पर्यन्त सोलह संस्कार संस्कृत में होते हैं। जैन और महायानी बौद्धों का समस्त विशाल साहित्य संस्कृत में है। विचार-विस्तार, भाषण का माध्यम संस्कृत है। आज भी हजारों विद्वान नानाविध विषयों में साहित्य से इसकी गरिमा को निरन्तर बढ़ाकर अपनी और संस्कृत की महिमा से अलंकृत हो रहे हैं। अतः संस्कृत एक जीवन्त सशक्त भाषा है।

यह सुखद आश्चर्य की बात है कि अमेरिका विशाल देश है। उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी भाग मैक्सिको और पनामा राज्य की सीमा का लगभग 20-22 वर्ष पूर्व अनुसन्धान किया गया। वहॉं अन्वेषण में एक मनुष्य समुदाय मिला। जाति विशारद विद्वानों ने उनके शरीर के श्वेत वर्ण के कारण उनका नाम व्हाईट इंडियन रखा और उनकी भाषा का नाम भाषा विशेषज्ञों ने ब्रोन संस्कृत रखा। इस अन्वेषण से यह सिद्ध होता है कि किसी जमाने में संस्कृत भाषा का अखण्ड राज्य था। हम सब बाली द्वीप का नाम जानते हैं। उसकी जनसंख्या लगभग पच्चीस लाख बताई जाती है। बाली द्वीप के लोगों की मातृभाषा संस्कृत है। इतने सबल प्रमाणों के होते हुए भी अंग्रेजों के मानस पुत्र संस्कृत को मृत भाषा कहने में नहीं चूकते। यह तो किसी को सूर्य के प्रकाश मेें न दिखाई देने के समान है। इसमें सूर्य का क्या दोष है! यह सरासर अन्याय और संस्कृत भाषा के साथ जानबूझकर खिलवाड़ है। संस्कृत तो स्वयं समर्थ, विपुल साहित्य की वाहिनी, सरस, सरल और अमर भाषा है।

साहित्य की विशालता- संस्कृत साहित्य का इतना विस्तार है कि ग्रीक एवं लैटिन दोनों भाषाओं का साहित्य एकत्र किया जाए तो भी संस्कृत साहित्य के सामने नगण्य प्रतीत होता है। संस्कृत साहित्य का मूल वेद है। वेदों के पाठ, शाखाएं, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक, उपनिषद्‌, श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र, धर्मसूत्र, शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, निघण्टु, छन्दशास्त्र, ज्योतिष, दर्शन, इतिहास, पुराण, काव्य, महाकाव्य, नाटक, शिल्प शास्त्र और तन्त्रादि का भी संस्कृत साहित्य में समावेश है। वेदों की ग्यारह सौ सत्ताईस शाखाओें में से कुछ शाखाएं उपलब्ध हैं। ललित कलाओं में भी संस्कृत साहित्य का नाम सर्वोपरि है। संस्कृत साहित्य की खोज ने ही तुलनात्मक भाषा विज्ञान को जन्म दिया। संस्कृत के अध्ययन ने ही भाषा शास्त्र को उत्पन्न किया। दर्शन और अध्यात्म तो हैं ही संस्कृत साहित्य की मौलिक देन। व्यवहारोपयोगी ज्ञान-विज्ञान की संस्कृत साहित्य में पर्याप्त रचना उपलब्ध है। धर्म विज्ञान, औषधि विज्ञान, स्वर विज्ञान, गणित, ज्योतिष आदि विषयों में योग्यता पूर्ण साहित्य संस्कृत में प्राप्त है।

सप्रमाण और गरिमा के साथ कहा जा सकता है कि अंकगणित दशमलव प्रणाली का सर्वप्रथम आविष्कर्ता भारत का मनीषी वर्ग था। शिल्प शास्त्र का विशाल संस्कृत साहित्य भारत की सर्वोपरि अमूल्य निधि है। भारतीय औषधि विज्ञान के बारे में अमेरिका के यशस्वी डॉक्टर क्लार्क का कहना है ""चरक की औषधियों का प्रयोग करना चाहिए।''

गीता, पंचतन्त्र और हितोपदेशादि संस्कृत साहित्य की महिमा विश्व की मुख्य भाषाओं में अनुदित होकर संस्कृत साहित्य में भारत का भाल उन्नत कर रही है।

मनुस्मृति जब जर्मनी में पहुँची तो वहॉं के विद्वानों ने इसका और जैमिनी के पूर्व मीमांसा दर्शन का अध्ययन करके कहा- ""हन्त! यदि ये ग्रन्थ हमें दो वर्ष पूर्व मिल गये होते तो हमें विधान बनाने में इतना श्रम न करना पड़ता।'' काव्य नाटक आदि के क्षेत्र में कोई भी भाषा संस्कृत की समानता नहीं कर सकती। वाल्मीकि तथा व्यास की बात ही कुछ और है। भवभूति, भास, कालिदास की टक्कर के कवि तो भारत के ही साहित्य में हैं। विश्व के किसी और देश में ऐसे साहित्यकार कहॉं हैं? भाषा का परिष्कार अलंकार शास्त्र से भारत में ही हुआ, अन्यत्र नहीं। अभिघा, लक्षणा, व्यंजना का मार्मिक विवेचन भारतीय मनीषियों की संस्कृत साहित्य में उपलब्धि है।

किसी भाषा के उत्कर्षापकर्ष का मापदण्ड उस भाषा की अक्षर माला के क्रम विन्यास तथा ध्वनियों के यथार्थ प्रतिनिधित्व पर निर्भर करता है। संस्कृत भाषा इस विषय में सर्वश्रेष्ठ है। संस्कृत भाषा का वर्ण एक-एक ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है। वर्णमाला की दृष्टि से भी संस्कृत वैज्ञानिक भाषा है। संस्कृत भाषा का शब्द भण्डार अथाह है। नवीन विचारों को प्रकट करने के लिए इसमें अद्‌भुत क्षमता है। योग्यतापूर्ण ढंग से यदि किसी ने पाणिनि व्याकरण पढ़ा हो तो किसी कोष की आवश्यकता नहीं रहती। कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कामन्दक नीतिशास्त्र, शुक्र और बृहस्पति के ग्रन्थ राजनीति परक हैं तथा वात्स्यायन का कामशास्त्र वैज्ञानिक ग्रन्थ है। सेना संचालन पर भी संस्कृत में विपुल साहित्य है। महाराजा भोज का संस्कृत प्रेम जग विख्यात है। भारवाहक के साथ उनके वार्तालाप में भारवाहक उनके वाक्य पर कटाक्ष करता है। इससे सिद्ध होता है कि उस काल में संस्कृत भाषा लोक-भाषा के रूप में प्रचलित थी, यह तथ्य सर्वविदित है। शल्य-चिकित्सा पर आज सार्वभौमिक साम्राज्य एलोपैथी का है। परन्तु भोज के युग में शल्य चिकित्सा उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर थी। सिर का बाल बड़ा बारीक होता है। बाल को लम्बा डालकर सीधे ढंग से दो बार शल्य-क्रिया (आप्रेशन) करना स्वयं में एक कीर्तिमान था। ढाका की मलमल विश्व में बारीकी के कारण मशहूर थी। वस्त्र निर्माण-प्रणाली संस्कृत-साहित्य में परिपूर्ण है। महाभारत में बच्चों के खेलने के खिलौने सुवर्णमय हुआ करते थेअर्थात्‌ सम्पन्नता और निर्माण का उद्‌भुत संगम था। महाराजा विशालदेव ने एक स्तम्भ बनवाया जो हवा, धूप, वर्षा के थपेड़े सहन करता है जिस पर आज तक जंग का कोई प्रभाव नहीं। यह किस अद्‌भुत रसायन का मिश्रण है और किन ग्रन्थों में इसका उल्लेख है इसका अध्ययन और खोजें होनी चाहिए। उपनिषदों में चौदह विद्याओं का नामोल्लेख सहित वर्णन है। आत्मा-परमात्मा विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान में उपनिषदों का विश्व के साहित्य में मूर्धन्य स्थान है। यह संस्कृत साहित्य को विश्व की अनोखी देन है।

अंग्रेजी और अंग्रेजों के अनुचर कुछ बाबू यह कहते नहीं थकते कि संस्कृत में अर्थकरी विद्या का अभाव है। वास्तविकता तो यह है कि संस्कृत का अध्ययन करने से धन भी मिलता है। साथ ही संस्कृत सादा व्यवहार और ऊँचे विचार की पोषक है। निर्धनता से संघर्ष हुआ करता संस्कृत भाषा का विद्वान जीवन-यापन करेगा, परन्तु आत्महत्या नहीं करेगा। आज बड़े-बड़े पदों पर विराजमान संस्कृत के मनीषी स्वावलम्बी जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

एक प्रेरणाप्रद घटना प्रस्तुत की जा रही है। भारत से एक शिष्टमण्डल रूस गया था । इसमें शहीद लाला जगतनारायण (हिन्द समाचार पत्र समूह के सम्पादक) भी गये थे। उन्होंने लौटने पर अपने वृत-पत्र में यात्रा का विवरण प्रस्तुत करते हुए लिखा था ""जब रशिया में पुस्तकालय देखने गये तो संस्कृत विभाग में भी गये । द्वार पर हमारा संस्कृत भाषा में स्वागत और परिचय हुआ। हमारे शिष्ट मण्डल में कोई भी संस्कृत नहीं जानता था। रशियन संस्कृत में पूछते, हम अनुवाद के माध्यम से अंग्रेजी में उत्तर देते। हमें बड़ी शर्म अनुभव हुई।
आगे बढ़े, संस्कृत पुस्तकालयाध्यक्ष के कार्यालय मे गये। वहॉं भी संस्कृत भाषा में रशिया वालों की ओर से प्रश्न और हम अंग्रेजी में उत्तर देते रहे। रेशमी करवस्त्र में मेज पर अध्ययनार्थ गीता रखी थी। पूछने पर उत्तर मिला कि कर्त्तव्य परायणता की प्रेरणा हम गीता से लेते हैं।''

1857 की

1857 की क्रान्ति का अग्रदूत प्रज्ञाचक्षु संन्यासी स्वामी विरजानन्द संस्कृत का उद्‌भट विद्वान था।

कृपया स्पष्ट करें कि उपरोक्त वाक्य प्रमाणिक है या नहीं ????
आर्यजन भ्रमित हैं |

राजेन्द्र आर्य‌

श्री

श्री भावेशजी नमस्ते |

आर्यसमाज ओनला‍इन में आपके विचार पढ़े नहीं जाते
कृपया मुख्य पृष्ठ पर भी दिया करें धन्यवाद |

राजेन्द्र आर्य‌