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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : सूर्य- प्रभा

सामवन्दना:

सूर्य- प्रभा

ओ३म् उदुस्त्रिया: सृजते सूर्य सचा उद्दन्न्क्षत्रमर्चिवत्|
तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि|| साम ७५२ ||

सूर्य निरन्तर प्रभा फेंकता, पर क्षीण नहीं होने पाये|
दम्पति ऐसे भोग भोगना, बल हीन नहीं होने पाये||

पत्नी उषा विहँसती जैसे,
दिनकर आभा तपती वैसे,
वह सतत फेँकता है प्रकाश
सृजन रचाता कैसे कैसे |

पल अतुल तेज वह भेज रहा, पर कोष नहीं चुकने पाये|
दम्पति ऐसे भोग भोगना, बलहीन नहीं होने पाये ||

दम्पति में भति भावना हो,
भोगों में यज्ञ कामना हो,
वे भोग उन्हें दे रोग नहीं
रसना से मुखर अर्चना हो |

नभ नक्षत्र प्रभा बिखराते, वे कभी नहीं डिगने पाये|
दम्पति ऐसे भोग भोगना, बल हीन नहीं होने पाये ||

दम्पति में सुन्दर संगति हो,
परिवार- वं‍श मे सम्मति हो,
हर रचना में हो उपासना
कुल में उत्पल सी प्रस्तुति हो|

दे उषा प्रिया मुस्कान जहाँ, पति सूर्य नहीं थकने पाये|
दम्पति ऐसे भोग भोगना, बल हीन नहीं होने पाये ||

(सामवन्दना : पं देवनारायण भारद्वाज रचित)

प्रेषक:

राजेन्द्र आर्य‌

सामवन्दना

सामवन्दना : सूर्य- प्रभा
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Submitted by Rajendra P.Arya on Thu, 2011-07-21 12:22. साम वन्दना
सामवन्दना:

सूर्य- प्रभा

ओ३म् उदुस्त्रिया: सृजते सूर्य सचा उद्दन्न्क्षत्रमर्चिवत्|
तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि|| साम ७५२ ||

सूर्य निरन्तर प्रभा फेंकता, पर क्षीण नहीं होने पाये|
दम्पति ऐसे भोग भोगना, बल हीन नहीं होने पाये||

पत्नी उषा विहँसती जैसे,
दिनकर आभा तपती वैसे,
वह सतत फेँकता है प्रकाश
सृजन रचाता कैसे कैसे |

पल अतुल तेज वह भेज रहा, पर कोष नहीं चुकने पाये|
दम्पति ऐसे भोग भोगना, बलहीन नहीं होने पाये ||

दम्पति में भति भावना हो,
भोगों में यज्ञ कामना हो,
वे भोग उन्हें दे रोग नहीं
रसना से मुखर अर्चना हो |

नभ नक्षत्र प्रभा बिखराते, वे कभी नहीं डिगने पाये|
दम्पति ऐसे भोग भोगना, बल हीन नहीं होने पाये ||

दम्पति में सुन्दर संगति हो,
परिवार- वं‍श मे सम्मति हो,
हर रचना में हो उपासना
कुल में उत्पल सी प्रस्तुति हो|

दे उषा प्रिया मुस्कान जहाँ, पति सूर्य नहीं थकने पाये|
दम्पति ऐसे भोग भोगना, बल हीन नहीं होने पाये ||

(सामवन्दना : पं देवनारायण भारद्वाज रचित)

प्रेषक:

राजेन्द्र आर्य‌