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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : कर्त्तव्यशील‌

सामवन्दना :
कर्त्त्व्यशील

ओ3म् इमा उ वां दिविष्टय उस्त्रा हवन्ते अश्विना |
ह्ययं वामह्वे $वसे शचीवसू विशं विशं हि गच्छथ: ||साम ७५३||

प्राण अपान जगत में जैसे, प्रतिपल रहते हैं क्रियाशील|
पति- पत्नी भी घर में वैसे, हर समय रहें कर्त्तव्यशील||

सूर्य‌- चन्द्र शिक्षक उपदेशक,
युग्म अश्विना नाम निदेशक,
संस्कृति के आधार अश्विना
पति- पत्नी इनके अनुरेखक |

इस जग के क्षणिक प्रलोहन में, हो जाय न व्रत में, कहीं ढील|
पति पत्नी भी घर में वैसे, हर समय रहें कर्त्तव्यशील ||

प्राण अपान प्रवाह बनाये,
दम्पति भी घर में रम जाये,
ये सतत शक्ति सम्पादक हो
यही जगत रक्षक बन आयें|

प्रजा जनों में कर वसेरा, यह प्राण प्रीति सुन्दर सुनील|
पति पत्नी भी घर में वैसे, हर समय रहें कर्तव्यशील ||

प्रभुवर का गुणगान किया है,
जग अश्विन का मान किया है,
कृति कर्म प्रभा के साधक बन
कर्मठ बन आह्वान किया है |

रवि कृति झील युत कमल खील, दो जोड़ जगत सुख कर्म कील|
पति पत्नी भी घर में वैसे, हर समय् रहें कर्तव्यशील||

राजेन्द्र आर्य‌

गीत स्तुति

गीत स्तुति (१)
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ओ३म् शंनो मित्र: शं वरुण: शं नो भवत्वर्य्यमा |
शं न इन्द्रो बृहस्पति: शं नो विष्णुरुरुक्रम: ||ऋग्वेद १|६|१८|८ ||

पाया गुरु मन्त्र बृहस्पति से, फिर अन्य गुरु से करना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

वरणीय वरुण प्रभु वरुपति हों, अर्य्यमा न्याय के अधिपति हों |
हमको परमेश ईशता दो, तुम इन्द्र हमारे धनपति हों ||

की याचना इन्द्र‌ धनपति से, फिर दर दर हमें भटकना क्या
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

अत्यन्त पराक्रम बलपति हो, तुम वेद बृहस्पति श्रुतिपति हो |
तन मानस का बल हमको दो, तुम विष्णु व्याप्त जग वसुपति हो ||

की सन्धि शौर्य के सतपति से, फिर हमें शत्रु से डरना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

प्रिय सखा सुमंगल उन्नति हो, हर सम‌य तुम्हारी संगति हो |
बन मित्र मधुरता अपनी दो, सुख वैभव बल की सम्पति दो ||

मित्रता विष्णु प्रिय जगपति से, फिर पलपल हमें तरसना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

(पं. देवनारायण भारद्वाज रचित गीत स्तुति का प्रथम प्रकाश)

लेखन:
राजेन्द्र आर्य,
362 ए, सुनामी गेट,गुरुनानकपुरा
संगरूर 148001 (पंजाब)

चलभाष : 9041342483