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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: ज्योति की परम्परा : ज्योति जले दिन रात मां तेरी ज्योति जले दिन रात‌

ज्योति की परम्परा

ओ३म् अयं सूर्य इवोपदृगयं सरांसि धावति |
सप्त प्रवत आ दिवम् || साम ७५६||

एक सूर्य नभ जैसा वैसे, भू पर तुम सूर्य अनेक बनो|
तुम नेक लखो तुम नेक कहो, हे प्रजाजनों तुम नेक बनो||

हर मनुज तेज रवि से पाता,
या ज्ञान वेद का अपनाता,
उपलब्धि जगत में वितरित कर
रवि तुल्य वही तो कहलाता |

ज्ञान सूर्य से दीप्ति प्राप्त कर, तुम उतम वीर विवेक बनो |
तुम नेक लखो तुम नेक कहो, हे प्रजाजनो तुम नेक बनो ||

रख गठरी नहीं छिपाता है,
वह पाता और लुटाता है,
बन सरस पर्श से सरस्वती
वह ऊपर उठता जाता है |

मत शुक ज्ञान की बात कहो, पा सरस ज्ञान अभिषेक बनो|
तुम नेक लखो तुम नेक कहो, हे प्रजाजनो तुम नेक बनो||

एक लोक से लोक दूसरा,
दो से ऊपर चढ़े तीसरा,
वह सात लोक आलोक चले
जग जाये ज्योति की परम्परा||

यह ज्योति ज्योति हो ब्रह्म ज्योति, उद्‍गार धनी उद्रेक बनो|
तुम नेक लखो तुम नेक कहो, हे प्रजाजनो तुम नेक बनो||

राजेन्द्र आर्य‌