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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : हृदय में क्रन्दन‌

ओ३म् दुहान: प्रत्नमित्पय: पवित्रे परि षिच्यसे|
क्रन्दं देवां अजीजन: ||साम ७६०||

मातायें करती आलिंगन, सुनकर वत्सों का परिरम्भन |
हे भक्त तुम्हारा यह क्रन्दन, सुनकर विह्वल हो शिवनन्दन ||

वाणी में तेरे वन्दन है,
अत्यन्त हृदय में क्रन्दन है,
क्या किन्तु गुणों को अपनाया
जो माँग रहा आलम्बन है |

चिर चेतन के यह गुण चन्दन, तुझे दिलायें गरिमा गन्धन |
हे भक्त तुम्हारा यह क्रन्दन, सुनकर विह्वल हो शिवनन्दन ||

प्रभु का पय ज्ञान बहाओ जी,
पय पान कर्म में लाओ जी,
प्रभुवर की विनत वन्दना कर
कुछ प्रभु सी शक्ति बढ़ाओ जी|

प्रभु के पय का दोहन मन्थन, जीवन में लाये गति ग्रन्थन |
हे भक्त तुम्हारा यह क्रन्दन, सुनकर विह्वल हो शिवनन्दन ||

केवल पीना प्रयाप्त नहीं,
हो जीवन में भी व्याप्त वही,
पय का परि सिंचन वर्षण हो
हो जीवन् उदय उदात्त यही |

प्रभुवर के गुण का अनुबन्धन, देता है जग का अभिनन्दन |
हे भक्त तुम्हारा यह क्रन्दन, सुनकर विह्वल‌ हो शिवनन्दन ||

राजेन्द्र आर्य‌