Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : पथ- दर्शक‌

पथ दर्शक

ओ३म् उपोषु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्ग परिष्कृतम्|
इन्दुं देवा अयासिषु||साम ७६२||

मातु- पिता- प्रिय गुरुजन सारे |
पथ- दर्शक हैं यही हमारे |

जब श्रेष्ठ जनों का साथ रहे,
निर्दोष प्रफुल्लित गात रहे,
तब प्रभु प्रकाश का हो विकास
स्फूर्ति तेज नित प्राप्त रहे |

जीवन में वैभव विस्तारे |
पथ- दर्शक हैं यही हमारे ||

दुर्व्यसन पराजित हो जायें,
प्रिय परिष्कार तप अपनायें
हम तन- मन- धन से निर्मल हों
सौन्दर्य शक्ति गति विकसायें|

प्रभु उपदेश अनघ उजियारे|
पथ- दर्शक हैं यही हमारे ||

हम प्रभुवर के गुण अपनाते,
श्रेष्ठ जनों में आते- जाते,
उनकी अविरल सत्संगति से
हम प्रगति पन्थ सुखमय पाते |

देते हमको सदा सहारे|
पथ- दर्शक हैं यही हमारे ||

राजेन्द्र आर्य‌