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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : सखाभाव‌

सखाभाव

ओ३म् पवमानस्य ते वयं पवित्रमभ्युन्दत:|
सखित्वमा वृणीमहे||साम ७८७||

प्रिय परम सखा का सखाभाव|
हो जीव तुम्हारा यह स्वभाव||

परम सखा हैं पावनकारी|
वे हमको करते अविकारी|
जब निज को स्वच्छ बनायें हम
तब बने साथ के अधिकारी||

अपना परखो सब हाव भाव|
हो जीव तुम्हारा यह स्वभाव||

प्रभु ओअवित्र का साथ मिलेगा|
विहस तुम्हारे साथ चलेगा|
हो विभव अभ्युदय में पवित्र
तेरा सुन्दर माथ खिलेगा|

हो व्यर्थ नहीं जग मे जमाव|
हो जीव तुम्हारा यह स्वभाव||

यदि तुमने यह उजियारा किया|
तो समझो उससे प्यार किया|
पवमान देव का पावन बन
यदि तुमने सच स्वीकार किया|

तब सखा सखा में हो लगाव|
हो जीव तुम्हारा यह स्वभाव||

राजेन्द्र आर्य‌

आदरणीय

आदरणीय आचार्य जी
नमस्ते
क्या यह साम वन्दना गीत पुस्तक रूप में उपलब्ध हैं ? यदि नहीं हैं तो फिर् हम इनके प्रिटओउट निकाल् लें, ताकि कहीं भी बैठ कर इनका स्वाध्याय किया जा सके, इनका रसास्वादन् किया जा सके | बहुत ही स्वाध्याय व प्रचार करने योग्य गीत हैं |

आनन्द‌

मान्यवर

मान्यवर आनन्दजी, नमस्ते|

सामवन्दना की पुस्तक मधुर प्रकाशन, 2804 गली आर्यसमाज, बाजार सीताराम, दिल्ली 110006
में मुल्य 18.00 रुपये (फरवरी 1997 संस्करण) उपलब्ध है उनका दूरभाष : 3238631 : 7513206
जो पुस्तक पर लिखा है| या पं देव नारायण भारद्वाज, "वरेण्यम्" M.I.G.(P) 45, Avantika
Colony (A.D.A) राम घाट मार्ग, अलीगढ़, उ.प्र. 202001 से उनकी सभी लगभग 15 काव्य, गद्द
संग्रह उपलब्ध हो सकते हैं | आनन्दजी आप चिन्तनशील आर्य हैं मुझे बड़ी प्रसन्नता है| आशा है आप
सामवन्दना पुस्तक अवश्य मँगवा लेंगे |

शुभेच्छु:

राजेन्द्र आर्य‌

बहुत् बहुत

बहुत् बहुत धन्यवाद | मैं अवश्य इस पुस्तक को लेना व बांट‌ना चाहूँगा |

आनन्द‌