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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : सहनशक्ति

सहनशक्ति

ओ३म् आ न: सोम सहो जुवो रुपं न वर्चसे भर ।
सुष्वाणो देववीतये ।। साम ८३४ ।।

कर नाथ तुम्हारी विभव भक्ति ।
मिल जाय हमें सद सहन शक्ति ।।

जो वीर्यवान बलवान बने,
वह सोमदेव की शान बने,
तन संचित वीर्य विधायक हो
मानव कर्मण्य महान बने ।

दे सोम हमें कर्तव्य युक्ति ।
मिल जाय हमें सद सहन शक्ति ।।

जब मेरे तन में बल होगा,
तब तेरा ध्यान प्रबल होगा,
तब हो तो तेरा सगुण रुप
इन नयनों में निश्चल होगा ।

अनुरूप रूप हो पुर्ण रिक्ति ।
मिल जाय हमें सद सहन शक्ति।।

इस जीवन में जब जब आती,
प्रभु की वाणी मार्ग दिखाती,
करती वर्चस्वी जगत में तो
ईश्वर से भी मेल कराती।

हो जीवन में ही मधुर मुक्ति।
मिल जाय हमें सद सहन शक्ति।।

राजेन्द्र आर्य‌