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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: पिपासा

पिपासा

ओ३म् सोमं गावो धेनवो वावशाना: सोमं विप्रा मतिभि: पृच्छमाना: |
सोम: सुत ऋच्यते पूयमान: सोमे अकर्रास्त्रिष्टुभ्भ: सं नवन्ते ||साम ८६० ||

प्रभुवर से प्रीति पिपासा हो, फिर विप्रों से जिज्ञासा हो |
प्रभु गीत पुनीत बनायेगा, यदि यह तेरी अभिलाषा हो ||

तू गाता है सुनती दुनियाँ,
प्रभु गीतों की मधुरिम ध्वनियाँ,
अपना गीत आप सुन पाये
तो हो जाये पूरी कमियाँ|

उर सागर की सोम लहर से, जीवन की नष्ट निराषा हो,
प्रभु गीत पुनीत बनायेगा, यदि यह तेरी अभिलाषा हो ||

यदि टीस हृदय में आवेगी,
तो खोज उदय हो जावेगी,
होगी तब दौड़ ज्ञानियों तक
प्रश्नों से आभा आयेगी|

यत्र तत्र सर्वत्र भ्रमण कर, प्रश्नों से पूरी आशा हो |
प्रभु गीत पुनीत बनायेगा, यदि यह तेरी अभिलाषा हो ||

प्रभु टीस गीत या प्रश्न प्रीत,
केवल इससे हो नहीं जीत,
आचरण शुक्रता ;आकर ही
तू पा सकता है परम मीत |

त्रै काम क्रोध वा लोभ थमें, तव मुखरित उर की भाषा हो|
प्रभु गीत पुनीत बनायेगा, यदि यह तेरी अभिलाषा हो ||

राजेन्द्र आर्य‌