Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: सोम- प्रेरणा

सोम- प्रेरणा

ओ३म् आ पवस्व महीमिषं गोम दिन्दो हिरण्यवत् ।
अश्ववत् सोम वीरवत् ।।साम ८९५।।

हे सोमनाथ दो अन्न हमें, हो प्रबल प्रेरणा संचारी ।
सोमनाथ की सोम प्रेरणा, हमें बनाये सोम विहारी ।।

निष्पन्न परिश्रम धारा है,
महनीय अन्न वह प्यारा है,
आया जो शुद्ध कमा‍ई से
सच्चा आधार हमारा है।

आये अन्न पवित्र बनाये, हम उसके ही हों आभारी।
सोमनाथ की सोम प्रेरणा, हमें बनाये सोम विहारी ।।

अपने शरीर की ज्ञानेन्द्रियाँ,
गौ ज्ञानवती हों सत्कृतियाँ,
ये स्वर्ण ज्योति सी चमक उठे
बनकर जीवन में सम श्रुतियाँ।

ऐश्वर्यवान की आभा सी, हो जिनमें जगमग उजियारी ।
सोमनाथ की सोम प्रेरणा, हमें बनाये सोम विहारी ।।

अपने शरीर की कर्मेन्द्रियाँ
हों अश्व ओज की अनुकृतियाँ,
हो कर्म वीर हम हरें पीर
कर सौम्य सोम की झंकृतियाँ।

बन इन्द्र वली सा महावीर, सुखी बनायें वसुधा सारी।
सोमनाथ की सोम प्रेरणा, हमें बनाये सोम विहारी ।।

राजेन्द्र आर्य‌