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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: रसपान‌

रसपान

ओ३म् रसं ते मित्रो अर्यमा पिबन्तु वरुण: कवे ।
पवमानस्य मरुत: ।।साम १०७८।।

प्रभु सभी कलाओं का स्वामी, सादृश्य कौन कर पायेगा ।
छू जाय कला की किरण जिसे, रसपान वही कर पायेगा ।।

मित्र अर्यमा वरुण कवी है,
हे सोमनाथ तू मसत सभी है,
स्नेह, न्यायप्रद, श्रेष्ठ काव्य कर
पावनकारी प्राण तुही है ।

इतना सामर्थ्य कौन पाये, जो सोमनाथ तक जायेगा।
छू जाय कला की किरण जिसे, रसपान वही कर पायेगा ।।

प्रभुवर से मैत्री रकना है,
तो प्रजाजनों से करना है,
न्यायी के निकट पहुँचने को
तेरा जग न्याय निखरना है ।

तू श्रेष्ठ लोक प्रिय हो जाये, प्रभु रसिक तुझे अपनायेगा ।
छू जाय कला की किरण जिसे, रसपान वही कर पायेगा ।।

जग दृश्य निहारो तुम वैसे,
कविराज निहारे जग जैसे,
अवगुण छोड़ गुणों को देखें
जग में रसस्त्रोत बहे ऐसे।

पीड़ित की प्राण सान्त्वना से, रससार तुझे मिल जायेगा ।
छू जाय कला की किरण जिसे, रसपान वही कर पायेगा ।।

राजेन्द्र आर्य‌