Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : वेद विनयी

वेद विनयी

ओ३म् राजानो न प्रशस्तिभि: सोमासो गोभिरञ्जते ।
यज्ञो न सप्त धातृभि: ।। साम ११२१ ।।

श्रद्धा का स्वर्ण संजोना है,
यदि तुम्हें अलंकृत होना है ।

राजा तो राजा ही ठहरा,
सबको भाता रूप सुनहरा,
न्याय नियम अपनाकर पायें
वह जनता से नाता गहरा ।

नयनों में नियम पिरोना है ।
यदि तुम्हें अलंकृत होना है ।।

यज्ञ स्वयं में सुन्दर रोचक,
पूजा- संगति दान विमोचक,
जब यज्ञ सात ऋषि करवायें
हो यज्ञ सुशोभित श्री पोषक ।

मख का नवनीत विलोना है।
यदि तुम्हें अलंकृत होना है ।।

विनयशील जन सबको भाते,
यदि वही वेद को अपनाते,
माधुर्य वक् सौन्दर्य सृजे
जग- आभूषण वे बन जाते।

श्रुति- रस में हृदय भिगोना है।
यदि तुम्हें अलंकृत होना है ।।

राजेन्द्र आर्य‌