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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: सोमवरण‌

सोमवरण

ओ३म् आ मन्द्रमा वरेण्यमा विप्रमा मनीषिणम् ।
पान्तमा पुरुस्पृहम् ।। साम ११३८ ।।

सोमनाथ का सोम पिया है ।
जग को जिसने सोम किया है ।।

सृष्टि सृजक प्रभु शक्ति सोम है,
औषधि का निष्कर्ष सोम है,
देह- इन्द्रियों से नि:सृत हो
मानव का वह वीर्य सोम है।

चन्द्र किरण ने सोम दिया है ।
जग को जिसने सोम किया है ।।

आत्म हर्ष तन हृदय श्रेष्ठता,
हरे न्यूनता पूरे पूर्णता,
मानस स्वामी बना मनीषि
करे सुरक्षा सोम देवता ।

उर- इच्छा उत्साह दिया है ।
जग को जिसने सोम किया है ।।

उच्च अभीप्सा सोम जगाये,
हर अंकुर जो वृक्ष बनाये,
उसे सुरक्षित श्रेष्ठ बना कर
आकर्षक फलफूल खिलाये ।

सुरभि- स्वाद भी हमें दिया है।
जग को जिसने सोम किया है ।।

राजेन्द्र आर्य‌