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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : तुम्हीं एक अपने

तुम्हीं एक अपने

ओ३म् त्वं हि न: पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभुविथ ।
अधा ते सुम्नमीमहे ।। साम ११७० ।।

प्रभु तुम्हीं एक तो सम्बन्धी, और किसे निज व्यथा सुनायें ।
छोड़ तुम्हारा एक बसेरा, और कहाँ हम बसने जायें ।।

तुमने सबको आवास दिया,
शुभ जीवन का विश्वास दिया,
तुम प्यारे पिता हमारे हो
तुमने रक्षा आभास दिया ।

पिता तुम्हारे संरक्षण में, हम क्यों व्याकुल होने पायें ।
छोड़ तुम्हारा एक बसेरा, और कहाँ हम बसने जायें ।।

अनन्त ज्ञान कर्म अनन्त हैं,
तुमसे विकसित सब बसन्त हैं,
तुम्हीं हमारी प्यारी माता
तुमसे पोषित दिग्- दिगन्त हैं ।

जो गोदी मां की पा जायें, वे क्यों अतृप्त रहने पायें ।
छोड़ तुम्हारा एक बसेरा, और कहाँ हम बसने जायें ।।

हम गीत अन्य के क्यों गायें,
हम शरण गैर की क्यों जायें,
माता- पिता नित पिता नमन कर
प्रभु को ही क्यों नही रिझायें ।

तुम्हीं सुरक्षा मोद तुम्हीं हो, तुमको श्रद्धा गीत सुनायें ।
छोड़ तुम्हारा एक बसेरा, और कहाँ हम बसने जायें ।।

राजेन्द्र आर्य‌