Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ये जप क्या होता है?

भारत के लोग ईश्वर मे बहुत अधीक विश्वास करते है.हर व्यक्ति चाहे डोक्टर हो या इञीनीयर सब लोग ईश्वर मे विश्वास रखते है.अनेक लोग तो ईश्वर के नाम का जाप करते है.उनके जाप करने कि विधि कुछ् इस प्रकार है.किसी भी स्थान पर बैठकर राम राम या क्ऋष्ण क्ऋष्ण करने लग जाते है.कुछ् लोग ऐसा हजार बार करते है.वे सोचते है कि इससे इश्वर हमे अच्छा फल देगा.लेकिन यह कैसे हो सकता है?मूह से निकला शब्द आसमान मे चला जाता है.तो क्या इश्वर केवल बाहर है जो कि मुख से बोलने पडता है?यदि ईश्वर केवल बाहर है तो वह सर्वशक्तिमान नही हो सकता है.क्योकि वह अपनी सीमाओ मे जी रहा है.और् फिर तुम्हारी मदद भी नही कर सकता है.क्योकि वह सीमाओ मे है और् अनेक लोग उससे मदद चाहते है तो वह मदद कैसे करेगा?तो इसलिये ईश्वर सब जगह है.वह तुम्हारे दीमाग मे भी है.जब दीमाग मे है तो बाहर क्यो बोले?कुछ् लोग मन मे भी राम राम करते रहते है.लेकिन उससे क्या होगा?क्या भग्वान यह चाहता है कि तुम उसको नाम बार बार लो?यदि ऐसा है तो ईश्वर बडा घमन्डी है.तो ऐसा करना बेकार है.लेकिन हमारा ईश्वर ऐसा नही है.वह यह चाहता ही नही है कि तुम उसका नाम लेओ.वह तो बस यही चाहता है कि तुम उसे याद रखो.'ओम क्रतो स्मर'. ओम नाम का स्मरण किया करो.उसका ध्यान कीया करो.उससे तुम ईश्वर के गुण याद रख सकोगे.यही जप होता है.जप यानी रटना नही उसे स्मऱण करना होता है.

Namastey to all arya

Namastey to all arya bandhus,
vinay arya , that is a good question, but the counter question from the article itself arises as well, what is need of even reciting "om" or any other vedic "stutis", what is the need to do "upasana" of parmeshwar, if he is omni present, & he is not proudy as well.
but still for better answer we need to wait for reply of arya vidwans rajendra aryaji, anand bakshi ji ,ravindrakumar arya ji etc,
Dhanyavad.

Always accept the truth and

Always accept the truth and decline the false
We have to just recall.Because we will get shanti.We will remember the qualities of the God.As we know that we forget everything after too much time.We read the qualities of parmeshwar from books ,we will forget them after sometime.
I should now explain what is upasana.
उपासना=जैसे गुण किसी के है वैसे अपने कर लेना
ऐसी परिभाषा सत्यार्थ प्रकाश मे बडे ही अच्छे तरह से विस्तार से बतायी है.तो जैसे गुण पर्मेश्वर के है वैसे अपने करे.जैसे पर्मेश्वर न्यायकारी है तो हम भी न्यायकरी बने.जैसे परमेश्वर दुष्टो को रुलाते है वैसे ही हम भी रूलाये.ऐसे परमेश्वर के अनेक गुण सत्यर्थ प्रकाश आदि वेदिक ग्रन्थो मे है.तो उन सब् को अपनाना ही उपासना है.पर्मेश्वर के गुण अपनाने से हमार जीवन धन्य हो जायेगा.

संक्षिप्त

संक्षिप्त में जप के लाभ:

मन के तीन दोषों राग, द्वेष और मोह की निवृत्ति और मन की शुद्धि से शान्ति, स्थिरता की प्राप्ति के तीन उपाय हैं:
१. शुद्ध ज्ञान
२. धार्मिक कार्य
३. ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना |

मन को एकाग्र करने के लिये ईश्वर का चिन्तन करना व उसकी आज्ञाओं का पालन करना अर्थात् योगाभ्यास करना तथा "गायत्री आदि मंत्रों का जाप करना चाहिये" | जप की परिभाषा विनय् आर्य ने सही बता दी है |

शुभेच्छु:

राजेन्द्र आर्य‌