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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : विकास : विनाश‌

विकास : विनाश

ओ३म् कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत् ।
कदा न: शुश्रवद । गिर इन्द्रो अङ्ग: ।।साम १३४३।।

तुझको जिसने ऐश्वर्य दिया, उसको ही तुझने भुला दिया।
इतना सारा ऐश्वर्य लिया, पर कितना तुने यज्ञ किया।।

जो भी ऐश्वर्य कमाया है,
वह प्रभुवर की ही माया है,
पूर्व साधना तप प्रताप ने
तुझको सम्पन्न बनाया है।

तू ने अपना स्वामित्व किया, भ्रम अहंकार यह पाल लिया।
इतना सारा ऐश्वर्य लिया, पर कितना तूने यज्ञ किया।।

धनवान भोग अनुरागी है,
यदि नहीं दान तप त्यागी है,
यह वैभव त्याग उसे जाता
रागी में लगती आगी है।

प्रभु ने तो तुझे विकास दिया, तूने ही स्वयं विनाश किया।
इतना सारा ऐश्वर्य लिया, पर कितना तूने यज्ञ किया।।

कितनी ही बड़ी महत्ता है,
क्षण में मिटती सब सत्ता है,
ज्यों पैर तले कुचला करता
लघु पादप कुकुरमुत्ता है।

फिर भी जब तूने ध्यान किया, दु:ख सुना नहीं अनसुना किया।
इतना सारा ऐश्वर्य लिया, पर कितना तूने यज्ञ किया ।।

राजेन्द्र आर्य‌