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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : रथ समरथ‌

रथ समरथ

ओ३म् अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईडित आ वह ।
असि होता मनुर्हित:।।साम १३५०।।

मेरे प्रभु प्यारे रथनायक।
मेरा रथ करदो सुखदायक।।

यह देह आत्मा का रथ है,
अति दुष्कर जीवन् का पथ है,
यात्रा का लक्ष्य तभी मिलता
जब होता यह रथ समरथ है।

हो जाये रथ प्रगति प्रदायक ।
मेरा रथ करदो सुखदायक ।।

सभी इन्द्रियाँ अङ्ग अङ्ग हो,
चलते रथ के सङ्ग् सङ्ग् हो,
यदि दिव्य गुणों का ईंधन हो
तो उत्तम रथ के रङ्ग् ढङ्ग हों ।

प्रभु के गुण रथ के उन्नायक।
मेरा रथ करदो सुखदायक।।

प्रभुवर मेरे रथ वाहक हैं,
रथ दुर्गुण के वे दाहक हैं,
वे रथी मनुज के हितकारी
शुभ कर्मों के ही ग्राहक हैं ।

प्रभु वन्दन रथ चाल सहायक।
मेरा रथ करदो सुखदायक ।।

राजेन्द्र आर्य‌

पं.

पं. देवनारायण भारद्वाज रचित पुस्तक "गीतस्तुति" जिसमें महर्षि दयानन्द के भक्तिपूर्ण ग्रन्थ आर्याभिविनय के मन्त्रों को गीत रूप में प्रस्तुत किया है, का प्रकाशन "मधुरलोक" सीताराम बाजार, दिल्ली ने अभी किया है।
प्राप्त करके आनन्दविभोर होवें बहुत ही उत्तम काव्य संकलन है।

राजेन्द्र आर्य‌