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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: स्वराज्य‌

स्वराज्य

ओ३म् उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये ।
महो राजान ईशते ।। साम १३५३ ।।

यदि तुम्हें स्वराज्य वांछित है, पहले अपने पर राज्य करो।
पहले अपने पर राज करो, फिर भूमण्डल पर राज करो।।

संयम से जीवन बीता है,
इन्द्रिय को जिसने जीता है,
जो सूर्य चन्द्र सा मर्यादित
उसको तो सभी सुभीता है।

यदि तुम्हें सुप्रीति वांछित है, तो अपना सुखी समाज करो।
पहले अपने पर राज करो, फिर भूमण्डल पर राज करो।।

जिनके संकल्प अखण्डित हों,
वे नहीं कहीं भी दण्डित हों,
जिनके सुविचारित निश्चय हों
वे ज्ञान कर्म के पण्डित हों।

यदि तुम्हें सुनीति वांछित है, तो व्रतपालन तुम आज करो।
पहले अपने पर राज करो, फिर भूमण्डल पर राज करो।।

जो स्वयं प्रभा अपनाते हैं,
वे जगत प्रभा फैलाते हैं,
जो तारे स्वयं चमकते हैं
वे ही नभ को दमकाते हैं।

यदि तुम्हें सुराज वांछित है, तो तेज ओज सरताज धरो।
पहले अपने पर राज करो, फिर भूमण्डल पर राज करो ।।

राजेन्द्र आर्य‌