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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : पुण्य या कार्पण्य‌

ओ३म् पदा पणीनराधसो नि बाधस्व महाँ असि ।
न हि त्वा कश्चन प्रति ।। साम १३५५ ।।

कुछ दान करो कुछ पुण्य करो ।
अपने वैभव को धन्य करो ।।

वाणिज्य करो धन ग्रहण करो,
रचकर कुचक्र मत हरण करो,
पददलित पतित हो जाओगे
अतिशय अपना मत भरण करो ।

बनो सुशोभित मालिन्य हरो ।
अपने वैभव को धन्य करो ।।

बस हानि लाभ हि लखते हैं,
छल कपट सभी नित करते हैं,
केवल अपने ही लिए सदा
जो गैरों का धन तकते हैं ।

कार्पण्य वृति कर्म‌ण्य करो ।
अपने वैभव को धन्य करो ।।

यदि तू उदारता अपनाये,
तो कौन सामना कर पाये,
पद तल नीचे कुचल कृपणता
तू यशमय सुन्दर हो जाये ।

धन लपक नहीं लावण्य करो ।
अपने वैभव को धन्य करो ।।

राजेन्द्र आर्य‌