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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : दुत्कार और दुलार‌

दुत्कार और दुलार

ओ३म् आ जामिरत्के अव्यत, भुजे न पुत्र ओण्यो: ।
सरच्जारो त योषणां वरो न योनिमासदम् ।। साम १३८७ ।।

इधर उधर सर्वत्र भटक कर, तुम चक्कर खूब लगाओगे ।
जब दौड़ दौड़ थक जाओगे, तब अन्त यहीं पर आओगे ।।

वह यहाँ गया या वहाँ गया,
वह खेल खेलने कहाँ गया,
जब उसे किसी ने धमकाया
तो बालक घर में दौड़ गया ।

मां की रक्षा के लिए वहाँ, तो बाहें फैली पाओगे ।
जब दौड़ दौड थक जाओगे, तब अन्त यहीं पर आओगे ।।

यों ही विषयों में फंसते हो,
वासना भ्रमर में धंसते हो,
जब जीर्ण शीर्ण हो जाते हो
तब पिता सदन में घुसते हो ।

भू से रवि तक उसकी बाहें, तुम सहज शरण पा जाओगे ।
जब दौड़ दौड़ थक जाओगे, तब अन्त यहीं पर आओगे ।।

तुम योनि योनि में भटक चुके,
दु:ख दावानल में अटक चुके,
कृशकाय और मृतप्राय हुए
अत्यन्त घृणित हो भटक चुके ।

दुत्कार मार हो सहन नहीं, प्रभु का दुलार तब पाओगे ।
जब दौड़ दौड़ थक जाओगे, तब अन्त यहीं पर आओगे ।।

राजेन्द्र आर्य‌

मै ऐसी आशा

मै ऐसी आशा करता हू कि नास्तिक लोग अब इस को जानकर आस्तिक हो जायेगे.

धन्यवाद।

Namastey Rajendera Arya

Namastey Rajendera Arya ji,
This is really good mantra which shows why a human should emphasize on doing good deeds in his/her life. Moreover, there is no longer term benefits of committing sins contained acts. Because as above mantra indicates, one will have no other option left to come out of this vicious circle , except he takes shelter of omniscient parmeshwar. Therefore, one should always make sure of consequences of his/her actions whether they are salubrious deeds for their soul to progress in upward direction or not.
Dhanyavad,
Kushal.

यथा रवि को

यथा रवि को धरा, सुत मां की गोद, पाकर कन्या वर पूर्ण हुआ,
मैं तथा मोक्ष पद पाऊँ प्रभो, जनिता वायु में विस्तीर्ण हुआ ।

धन्यवाद आर्य बन्धुवर । सामवन्दना प्रकोष्ठ में मैं सामवेद मन्त्रों का गीतानुवाद क्रमश: प्रस्तुत कर रहा हूँ पं. देव नारायण भारद्वाज जी का मेरे पास आशीर्वाद‌ फोन भी आया था ।

राजेन्द्र आर्य‌