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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : सम्पत्ति या श्रीपति

सम्पत्ति या श्रीपति

ओ३म् न की रेवन्तं सख्याय विन्दसे पीयन्ति ते सुराश्व ।
यदा कृणोषि नदुनं समूहस्यादित्पितेव हूयसे ।। साम १३९० ।।

जिसने तुझको धन‌ धान्य दिया, उससे तुझने मुँह मोड़ लिया ।
सम्पत्ति से नाता जोड़ लिया, श्रीपति से नात तोड़ दिया ।।

वैभव तो बहुत कमाया है,
कुछ खाया और खिलाया है,
मदिरा पीकर मद मस्त हुआ
प्रभु सखा याद कब आया है ।

प्रभु सखा पुराना छोड़ दिया, नव दुरित सखा तक दौड़ लिया।
सम्पति से नाता जोड़ लिया, श्रीपति से नाता तोड़ दिया ।।

यदि यदा कदा प्रभु नाम लिया,
कुछ यज्ञ तीर्थ व्रत धाम किया,
वैभव का खूब प्रदर्शन कर
व्यसनों में ही विश्राम किया।

संयम मर्यादा छोड़ दिया, प्रभु से करके होड़ जिया।
सम्पत्ति से नाता जोड़ लिया, श्रीपति से नाता तोड़ दिया ।

हुआ अचानक प्रभु का गर्जन,
तेरे मद वैभव का वर्जन,
सारे समूह का नाश हुआ
रहा न तू और न तेरा धन ।

धन सुरा कलश सब फोड़ दिया, पर तुझे पिता ने गोद लिया ।
सम्पत्ति से नाता जोड़ लिया, श्रीपति से नाता तोड़ दिया ।।

राजेन्द्र आर्य‌

आजकल जो

आजकल जो व्यक्ति धनवान दिखायी देते है वे सब ईश्वर को भूल जाते है.कुछ लोग पैसे की मूर्तिपूजा करके यह नाटक तो कर देते है.वे केवल दिखवा ही करते है.किन्तु मन मे उस प्रभु को जिसने उसे यह दौलत दी है उसका धन्यवाद कभी इस तरह से नही करते है‍:‍हे ईश्वर।आपने मुझे यह इतना सब कुछ धन दिया है यह सब आप ही की क्ऋपा है मै इस दिये हुए धन का उपयोग आपके बताये अनुसार मानव कल्याण मे लगाऊगा.ऐसा कौनसा धनढ्य है जो कि ऐसी प्रार्थन अपने मन मे ही करता हो?

धन्यवाद।

विनय आर्य‌