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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : सुसन्तति

-ओ३म् ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्षणे ।
अग्ने यद्दीदयद्दिवि ।। साम १३९८ ।।

जो सन्तति की हमको प्रदान, प्रभुवर यह कृपा तुम्हारी है ।
सन्तति सुयोग्य बन जाये यह, प्रभुवर, नत विनय हमारी है ।।

वर्षानुवर्ष जब बीत गये,
बिन सन्तति दिन विपरीत गये,
सुनकर समाज के तानों को
हो सचमुच हम भयभीत गये ।

प्रभु हुई अचानक अनुकम्पा, घर में आई उजियारी है ।
सन्तति सुयोग्य बन जाये यह, प्रभुवर, नत विनय हमारी है ।।

सूखा जीवन उद्दान बना,
आंगन अनुपम मुस्कान बना,
शिशु शैशव की क्रिडाओं से
आशा का विमल् वितान् बना ।।

दे दिये फूल दो सौरभ भी, बिन सुरभि व्यर्थ फुलवारी है ।
सन्तति सुयोग्य बन जाये यह, प्रबुवर, नत विनय हमारी है ।।

जो सन्तति दो, सद सन्तति हो,
शुभ क्रियाशीलता सम्मति हो,
सन्तान न हो पीड़ादायक
कुल में सुकीर्ति की उन्नति हो ।

सन्तान करे उत्साह दान, यदि नम्र सौम्य अधिकारी है ।
सन्तति सुयोग्य बन जाये यह, प्रभुवर, नत विनय् हमारी है ।।

राजेन्द्र आर्य‌