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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : मन्त्र मिलन‌

ओ३म् तत्ते यज्ञो अजायत तदर्क उत हस्कृति: ।
तद्विश्वमभूरसि यज्जातं यच्च जन्त्वम् ।। साम १४३० ।।

जो यज्ञों में ढल जायेगा, जीवन जब होगा उपकारी ।
तब मन्त्र विहँसते आयेंगे, दे जायेंगे महिमा भारी ।।

मन्त्रों को तो बुला रहे हो,
यज्ञों से जी चुरा रहे हो,
इसलिए मन्त्र हैं दूर दूर
स्वयं न सुन, बस, सुना रहे हो ।

उनको सुनकर अपनाओगे, हो जायेगी उनसे यारी ।
तब मन्त्र विहँसते आयेंगे, दे जायेंगे महिमा भारी ।।

वासना विषय का क्षय होगा,
मन वशिभूत निश्चय होगा,
हर और तुम्हारे हास्य प्रभा
अनुपम आनन्द उदय होगा ।

फल फूल खूब खिल जाये‍गे, होंगी सुरभित जग फुलवारी ।
तब मन्त्र विहँसते आयेंगे, दे जायेंगे महिमा भारी ।।

ज्यों रवि प्रकाश का दाता है,
त्यों मन्त्र पन्थ दिखलाता है,
उत्पन्न हुआ या होगा जो
सबका अधिकार दिलाता है ।

तुम प्रथम स्वयं अपनाओगे, अनुसरण करेंगे संसारी ।
तब मन्त्र विहँसते आयेंगे, दे जायेंगे महिमा भारी ।।

राजेन्द्र आर्य‌